कनाडा के प्रकाशन ‘द प्रॉविंस’ (मङ्गलवार, १ मई १९९०) से, लेखक: क्रॉफ़र्ड किलियन।
ऍडॉल्फ़ हिटलर के बहुत से जोड़ीदार हैं
मेरे वकील साहब, निक मेफ़िस्टो, कल मुझे जश्न मनाने दावत पर ले गए, चिन्ता हुई।
निक साहब अजीबोगरीब चीज़ों की वकालत करते हैं। वह जिन चीज़ों की वकालत करते हैं, जिन चीज़ों का वह जश्न मनाते हैं, आम लोगों को उनसे घिन ही होती है।
‘ऍडॉल्फ़ हिटलर की ४५वीं सालगिरह है,’ निक साहब ने फ़रमाया ‘मेरे मुवक्किल ३० अप्रैल १९४५ से उनकी आवभगत कर रहे हैं- और साथ ही उनकी छीछालेदर भी कर रहे हैं।’
‘मेरा अन्देशा है कि आपके मुवक्किल को ऐसे दैत्य पर बहुत नाज़ है।,’ मैंने कहा।
‘अमा, हिटलर कोई दैत्य वैत्य नहीं था।’
‘क्या! द्वितीय विश्व युद्ध का कारक, थोक में हत्या करने वाला जल्लाद, दैत्य नहीं था?’
‘याद कीजिए, मेरे मुवक्किल ने बाल धूप में सफ़ेद नहीं किए है। हिटलर तो एक आम सा नेता था।’
‘क्या बेहूदी बात कर रहे हैं आप! वह तो बहुत बुरा आदमी था।’
‘अच्छा तो बताइए हिटलर का गुनाह क्या था? वह नस्ली और सांस्कृतिक श्रेष्ठता को मानता था। और वह यह मानता था कि श्रेष्ठ नस्लें और संस्कृतियों को दूसरों के देशों पर आक्रमण करके उनको दास बनाने और मारने तक का अधिकार था।’
‘मैंने कहा था न कि वह बहुत बुरा आदमी था।’
‘अमाँ यार यह बताओ कि कोलम्बस के ज़माने से यूरोप में लोग और कर क्या रहे हैं? मेक्सिको और दक्षिण अमेरिका पर जीत हासिल करने के बाद अगले ८० साल में वहाँ के लोगों की जनसंख्या १०० की १० हो गई। यानी करीब ४ से ५ करोड़ लोग मारे उन्होंने। हिटलर ने थोड़ी जल्दी मारे, पर स्पेन वालों से कम ही मारे।’
‘अरे निक साहब, -’
‘फ़्रांस वालों ने अफ़्रीका और उत्तरपूर्व एशिया पर चढ़ाई की, और क्वेबेक पर भी। अंग्रेज़ यह मानते थे कि उनका अधिकार था सभी ‘नीचे लोगों’ पर शासन करना – किपलिंग ने यह संज्ञा दी थी। बेल्जियम वाले कॉङ्गो को किसी यातना गृह की तरह ही चलाता थे। डच और पुर्तगाली-’
‘हाँ भई माना, पुराने साम्राज्यवादी बुरे थे, पर नाज़ियों से बुरे तो कतई नहीं थे।’
निक मेफिस्टो ने बस कन्धे उचका दिए। ‘यूरोप वाले यह मानते थे कि वह “श्रेष्ठ” हैं, इसलिए वह और लोगों की संस्कृति का गला घोंटने, उन्हें दास बनाने, हत्याएँ करने, देश से निकालने के पूरे पूरे हकदार हैं। और इसी नीति के आधार पर यूरोप का झण्डा सैकड़ों सालों तक ऊँचा रहा। मेरे मुवक्किल की नज़र में, हिटलर ने बस एक गलती की।’
‘और वह गलती क्या थी जनाब?’
‘उसने यूरोपियनों पर गाज गिराई।’
‘बिल्कुल सही, पर-’
‘अगर उसने मूल भारतीयों, अफ़्रीका के कालों, या एशियन लोगों को मारा होता, तो उसके पड़ोसियों को कोई फ़र्क न पड़ता। आखिर उन सबने भी तो यही किया था न। लेकन यूरोप के लोगों को भी उसी तराज़ू से तोलना उन्हें नागवार गुज़रा।’
‘बहुत हो गया साहब! अगर हिटलर जीत जाता, तो हम सैकड़ों सालों तक अंधकार में डूब जाते।’
‘हाँ, मूल भारतीय भी १४९२ से उसी अंधकार में डूबे हैं, और अफ़्रीकी लोग भी। कोशिश करने की तो मेरे मुवक्किल पूरी दाद देते हैं, लेकिन असली इज़्ज़त तो उन्हों ही नवाज़ते हैं जो सफल विजेता हैं – जो मार काट कर के राष्ट्र की शान बन जाते हैं।’
‘तो आप यह कह रहे हैं कि हम नाज़ियों जितने ही बुरे हैं।’
‘न न, हम थोड़ी ज़्यादा नज़ाकत वाले हैं। वैसे मेरे मुवक्किल साहब यह ज़रूर कहते हैं कि कनाडा की सुरक्षा नीति यही कहती है कि हमें अपनी पसन्द की दुकान में खरीदारी करने से रोकने वाले किसी भी देश पर नाभिकीय हथियार गिरा दो। और अधिकतर कनाडा वासी इस नीति का पुरज़ोर समर्थन करते हैं, भले ही वैंकूवर में हर साल शान्ति यात्री कितनी ही तादाद में आएँ।’
मेरी दिमाग़ की बत्ती जली ‘यानी कि हिटलर के जोड़ीदार बहुत हैं?’
वकील साहब अब मुस्कुराए। ‘बहुत से भी ज़्यादा, और लगातार पैदा हो रहे हैं हिटलर के जोड़ीदार। नस्लवादी जब मरते हैं तो उन्हें आजकल नरक में घर ढूँढना मुश्किल हो गया है, इतनी भीड़ हो गई है वहाँ।’
किलियन जी, थोड़ी नुक्ताचीनी, “मूल भारतीय” नहीं, “मूल अमरीकी” होना चाहिए।
Original article in English
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वाह! कल अंग्रेजी में पढ़ा था। पर हिन्दी में पढ़ना ज्यादा आनन्ददायक रहा।
हर कोई हिटलर है और हर कोई गांधी/मार्टिन लूथर किंग। बस डिग्री का अन्तर है।