कुछ समय पहले मैंने भारत द्वारा पाकिस्तानी जिहादी गुटों को दान पर क्षोभ व्यक्ति किया था और फिर उसी लेख की टिप्पणियों का एक प्रत्युत्तर दिया था। पहले लेख की टिप्पणी के तौर पर तनवीर ने लिखा था:
अतनु: आप ठहरे अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट, आपको तो दुनियादारी के बारे में अच्छी तरह मालूम ही होगा। हर चीज़ के लिए तार्किक कारण नहीं होता है, खासतौर पर राजनीति की दुनिया में। आपके तर्क के आधार पर, जब भारत खुद नाभिकीय हथियारों पर इतना खर्च करता है, तो उसे भी किसी प्रकार के अनुदान की उम्मीद करना गलत है। और चूँकि अमरीकी फौज का खर्चा बाकी पूरी दुनिया से कहीं अधिक है, इसलिए अमरीका को अमन और शान्ति की बात करने का कोई हक़ नहीं है। लेकिन फिर भी अमरीका संयुक्त राष्ट्र को पैसा देता है, और जब मन होता है तो उसकी अवमानना कर के अपनी मर्जी से भी काम करता है। जिस भी देश की फौज है, उसे विनाशक त्सुनामी के समय कोई आर्थिक सहायता नहीं मिलनी चाहिए थी। लेकिन दुनिया ऐसे नहीं चलती है साहब। जहाँ तक मुस्लिम आक्रमणकारियों से सम्बन्धित आपकी टिप्पणियों का सवाल है, तो आपको याद रखना चाहिए, “खून के बदले खून का मतलब पूरी दुनिया में सब खूनी, और ज़िन्दा कोई भी नहीं” साथ ही, अगर हमें अपने इतिहास को ले के इतनी ही चिन्ता है तो हमें बरतानिया का हाई कमीशन बन्द कर देना चाहिए। कम से कम जब तक अंग्रेज़ यहाँ आए, भारत सबसे अमीर देश था। सिर्फ़ मिसाइल का नाम बदल देने से उसका चरित्र नहीं बदल जाता है। चाहें पृथ्वी हो या ग़ौरी, मरेंगे तो उतने ही लोग।
दुनियादारी समझने के लिए अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट लेना ज़रूरी नहीं है। साधारण अक्ल वाला कोई भी यौवन को प्राप्त व्यक्ति थोड़ा बहुत विचार कर के खुद दुनियादारी के बारे में समझ सकता है। मेरी पूरी दलील का मूलभूत सिद्धान्त लेख के पहले वाक्य में निहित है: पैसे का कोई चरित्र नहीं होता।
किसी भी इकाई के पास सीमित संसाधन होते हैं, चाहे वह इकाई एक अकेला इंसान हो या भरापूरा राष्ट्र। यह उस इकाई की मर्ज़ी है कि वह उन संसाधनों का इस्तेमाल कैसे करें। अगर वह इकाई विनाशक गतिविधियों में संसाधनों को खर्च कर देती है, तो ऐसे फ़ैसले लेने वाली इकाई को और अधिक संसाधन दान में देना और उनको प्रोत्साहन देना किसी भी दृष्टि से नैतिक तो है ही नहीं। इतना ही नहीं यह पूरी तरह अदूरदृष्टिपूर्ण और अनैतिक है। अगर कोई भी देश, किसी दूसरे देश में हाहाकार मचाने के लिए अपने आप को लामबन्द करने में ही अपने संसाधन नष्ट करने पर तुला हो, तो उस देश को किसी से सहानुभूति या भौतिक सहायता की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, देश चाहें जितना बदहाल हो। यह मापदंड मैं सभी राष्ट्रों पर लागू करूँगा ही। आतङ्की राष्ट्रों के मामले में इस बात पर और ज़ोर दूँगा।
इस मानक के आधार पर मैं यहीं कहूँगा कि न तो भारत को किसी और राष्ट्र द्वारा मदद दी जानी चाहिए, न ही ऐसी मदद दिए जाने पर भारत को स्वीकारना चाहिए। जब तक महाविनाश के अस्त्रों और शस्त्रों को एकत्रित करने में भारत अपना अल्प धन खर्च कर रहा है, यही सर्वोचित है। मुझे इस बात का अहसास है कि भारत के पड़ोसी खतरनाक हैं, और नाभिकीय असले से लैस पड़ोसियों को धमका के रखने के लिए भारत को भी नाभिकीय अस्त्र चाहिएँ और उनके प्रक्षेपण के लिए मिसाइलें भीI लेकिन नीति के आधार पर भारत को किसी और राष्ट्र से दान नहीं लेना चाहिए।
ज़रूरी बात। जो देश अपने सीमित धन का इस्तेमाल भारत को नष्ट करने के लिए हथियार खरीदने में ही खर्च कर डालते हैं, उन्हें तो दान कतई नहीं देना चाहिए। इसके दो कारण हैं, पहला, कि पैसे का कोई चरित्र नहीं होता: भारत, गरीबों को रोटी खिलाने के लिए पैसे दे या आम निरीह भारतीयों को मारने के लिए जिहादियों की बड़ी फौज खड़ी करने के लिए पैसे दे – पैसा तो पैसा ही है, एक पैसे को आप दूसरे पैसे से अलग नहीं पहचान सकते हैं। ऐसे पैसा देना ग़ैरज़िम्मेदारी है और अनैतिक है। इस प्रकार की बावलेपन वाली हरकत आखिर होती क्यों है यह समझना भी आसान ही है। जिनके पास दानवीर कर्ण बनने की ज़िम्मेदारी है वे स्वयं तो इसके दुष्प्रभाव से सर्वथा सुरक्षित ही हैं। अगली बार जब जिहादी आतङ्कवादी – भारतीय नेताओं द्वारा दिए पैसे से – आतङ्क फैला के भारत में बीसियों लोग मारेंगे, तो इन दानवीरों को अपना खून पसीना थोड़ी बहाना होगा। बहुत दुख की और अशोभनीय बात है कि नेताओं के पास कड़ी सुरक्षा है (और सड़क पर चलने वाले आम आदमी के पास नहीं है) इसलिए अपने किए का फल उन्हें कभी भुगतना ही नहीं पड़ता।
राष्ट्रों द्वारा दान के विरोध का मेरा दूसरा कारण है – दान वैकल्पिक, स्वेच्छा से दिया जाना चाहिए। अगर मैं आपकी जेब काटूँ और फिर वह पैसा दान कर दूँ, तो भी इसमें कोई बड़ाई तो नहीं है न? और भी बुरा, अगर मैं चक्कू की नोंक पर पैसे हड़पूँ और फिर पैसा भी दूँ उसे जिसे आप कभी देना नहीं चाहते थे। भारत सरकार, करदाता का पैसा ले के उसका कुछ हिस्सा पाकिस्तान को देते समय ठीक यही करती है। भारत के लोगों को इस बात की आज़ादी दी जानी चाहिए कि वे किसे दान देना चाहते हैं। भारत का नागरिक होने के नाते प्रधानमन्त्री जी अपना खुद का पैसा पाकिस्तान भेजने को स्वतन्त्र हैं, और बाकी नागरिक भी इसी तरह स्वतन्त्र हैं। लेकिन मेरा पैसा ले के पाकिस्तान में बाँट देना – यह बिल्कुल अनैतिक है। उन्होंने मेरी इज़ाज़त नहीं ली है, और इज़ाज़त लिए बगैर भी यह समझना मुश्किल नहीं है कि मैं कभी पाकिस्तानी जिहादियों को अपनी कमाई भेजने की हिमायात नहीं करूँगा। हमारे प्रधानमन्त्री जी मन ही मन इतना भर विचार कर लें – भारत के ४० करोड़ लोग दिन में एक डॉलर नहीं कमा पाते हैं। उनसे अगर वे इन ४० करोड़ लोगों से पूछें कि भइया, अपने यहाँ आतंक फैलाने के लिए ढाई करोड़ डॉलर पड़ोस में दे दें क्या – तो क्या जवाब मिलेगा उन्हें?
प्ररधानमन्त्री को पूर्ण आदर के साथ मैं यही कहना चाहूँगा कि यह बेवकूफ़ी है। इसके लिए मैं उन्हें ज़िम्मेदार मानता हूँ। यह बात मैं उनके मुँह पर भी कह सकता हूँ।
साथ ही यह भी कहना चाहूँगा कि यह कुछ नया नहीं है। भारतीय प्रधानमन्त्री चिरकाल से पाकिस्तान के मामले में बेवकूफ़ी वाली नीतियाँ लागू करते आएँ हैं। शुरुआत हुई नेहरू से। पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण किया और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के आगे मामला टिका दिया। उनकी बेटी इन्दिरा ने यह कचरा साफ़ करने की कोई कोशिश नहीं की। पाकिस्तानी फौज की शर्मनाक हार के बाद, सारे पत्ते हमारे हाथ में थे, हमारे पास ९०,००० पाकिस्तानी युद्धबन्दी थे, लेकिन फिर भी अपनी बात मनवाना उन्हें नहीं आया। फिर वाजपेयी ने पृथ्वीराज चौहान की परम्परा को निभाया। चल पड़े “बस यात्रा” पर और मुशर्रफ़ की ओर से बस की सीट के पीछे से छुरा घुँपवा के आए। नहीं यह मैंने गलत कहा। छुरा उन्हें नहीं लगा – एक हज़ार गरीब सिपाहियों को लगा जो करगिल की बर्फ़ में दब के मर गए। वाजपेयी जी अपने पहले वालों की तरह अपने घर में आराम फ़रमा रहे थे, पूर्णतः सुरक्षित। न तो नेहरू पर कोई असर पड़ा और न ही उनके भाई बन्धुओं पर। भारतीय सेना में जो फौजी भरती होते हैं वही इन गलतियों की कीमत चुकाते हैं – अपनी जान दे के। गरीब फौजी कटते हैं, और उसके बाद नेहरू जैसे लोग, लता मङ्गेशकर के “ऐ मेरे वतन के लोगो“ सुन कर घड़ियाली आँसू बहाते हैं।
अर्थशास्त्री हमेशा यह कहते हैं कि जब तक नीति निर्धरकों को प्रलोभन सही दिए जाएँगे, दुनिया किसी भी समस्या का सही समाधान खोजने को तत्पर रहेगी। मैं पूरी तरह से इस बात को मानता हूँ। आधुनिक युद्ध की समस्या, प्रलोभन की ही है। अगर खुद के बच्चे ईराक़ में भेजने पड़ते तो मूर्ख बुश आक्रमण करने को कितना तत्पर होता? अगर अमरीकी सिनेटर बनने के लिए बच्चों को फौज में भर्ती करना ज़रूरी होता तो अमरीकी सिनेट दुनिया में कितने युद्धों की मञ्जूरी देती? अगर सरकार चलाने वालों के सभी बच्चों का फौज में होना लाज़िमी होता तो कोई भी सरकार कितने युद्ध शुरू करने की सोचती? नेताओं की वजह से ही, और कभी कभी सेनापतियों की वजह से – जिन्हें कुछ खोने का डर नहीं है – इतने युद्ध होते हैं।
वापस तनवीर की टिप्पणी पर आते हैं। हाँ, अगर कोई देश अपने खिलाफ़ भविष्य में होने वाले युद्धों की तैयारी में लगा हो तो वह अपने नागरिकों की त्सुनामी या भूकम्प के समय में मदद करने के काबिल नहीं होता। अगर पाकिस्तान अमरीका को पाँच खरब डॉलर दे कर ऍफ़१६ विमान खरीदता है, और उसके बाद कटोरा ले के कुछ लाख डॉलर की भीख माँगता है ताकि उसके नागरिकों की मदद की जा सके, तो दया और धन के बजाय ढोंगी, पाखण्डी पाकिस्तान को तिरस्कार मिलना चाहिए।
जब भी गैर सरकारी संस्थान पूरी दुनिया में जा के गरीबों की मदद करने के लिए भीख माँगते हैं तो मुझे यह यह समझ नहीं आता कि वे दुनिया भर की सेनाओं द्वारा संसाधन नष्ट करने पर वे कुछ क्यों नहीं करते। मैं खुद इनका स्वयंसेवक रहा हूँ, और हाँ, मानता हूँ, यह मेरी मूर्खता थी। एक संस्था के स्वंयसेवी पैसा इकट्ठा करने में काफ़ी समय लगाते थे। कुछ लाख डॉलर के लिए। और फिर इसके लिए वह अपने आपको साधुवाद देते थे। यही समय सैन्य खर्चा कम करने की सोच में लगाया जाता, युद्ध के आगे की सोचने में लगाया जाता, तो करोड़ों डॉलर बचते – सिर्फ़ शिक्षा आदि के लिए कुछ लाख नहीं। लेकिन नहीं। अनुपयुक्त प्रणाली को बदलने के के बारे में सोचने के बजाय बस चन्द पैसे इकट्ठे करना, संस्थाओं को मूर्खता है।
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मैंने लेखन बन्द किया है। कारण? मैं निराश हो चुका हूँ, पूरी तरह। कुछ दिनों से यह सोच रहा हूँ कि यह प्रणाली इतनी खराब है कि इसे बदलने की कोशिश भी करना बेकार है। अनन्त चक्र है। राजा बुरा है क्योंकि प्रजा अज्ञानी और मूर्ख है। राजा बुरा है तो प्रजा सुधरेगी भी नहीं। मुझे विश्वास है कि कुछ पाठक बहुमत को अज्ञानी और मूर्ख कहे जाने पर आपत्ति करेंगे। लेकिन आप सिद्ध करें कि बहुमत अज्ञानी और मूर्ख नहीं है। इतनी बुरी हालत के लिए ज़िम्मेदार कौन है? भारत में २५ करोड़ लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं, और यह रेखा खुद इतनी नीचे है कि आपको ऊपर रहने के लिए बस दिन की २००० कैलोरी खरीदनी होंगी। सोचिए: अगर २००० कैलोरी खरीदने लायक आपके पास दिन के सात रुपए हैं तो आप गरीबी रेखा के ऊपर हैं। इस परिभाषा के अनुसार तब आप गरीब नहीं हैं। लेकिन फिर भी पच्चीस करोड़ लोग – पूरे पश्चिमी यूरोप की जनसङ्ख्या के बराबर के लोग – ऐसे हैं जिनके पास उतना भी नहीं है। इस खड्ड में हम पहुँचे कैसे? जब भारत आज़ाद हुआ था तो बस ३५ करोड़ लोग थे, आधे गरीब। इतने सालों के विकास, उन्नति, प्रगति, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों, नेहरूवादी समाजवादी कार्यक्रमों के बाद हमने बिल्कुल गरीब लोगों की सङ्ख्या में साढ़े सात करोड़ और जोड़ दिए हैं, घटाना तो दूर की बात। अगर वास्तव में यह राष्ट्र सामूहिक रूप से इससे बेहतर काम करने लायक था, तो ऐसा क्यों हुआ? क्या नेता मूर्ख थे? या जो लोग हर बार इन चोरों को सत्ता दे देते थे, वह मूर्ख थे?
जिन नीतियों ने हमें गड्ढे में डाल दिया है, वैसी ही और भी लगातार आ रही हैं। और क्यों न आएँ? प्रलोभन का ढाँचा तो नहीं बदला है। नेताओं और नौकरशाहों को अभी भी उन्हीं विफल नीतियों को लागू करने का प्रलोभन है। अर्थव्यवस्था की हालत बुरी होती है पर उनकी नहीं। जब तक प्रलोभन का यह ढाँचा नहीं बदलेगा, भारत के लिए कुछ आशा करना बेकार है।
खेद है कि मैं खुशी के गीत गाते हुए, भारतीय उपभोक्ता का गुणगान करते हुए, विकास से भारत के परिवर्तन की कहानी नहीं सुना रहा। यह गान करने वाले लोग अधिकतर बेहोशी की हालत में होते हैं। शायद मैं भी किसी दिन यह भाँग का गोला खा के मस्त हो जाऊँ। लेकिन तब तक नीति निर्धारकों के प्रलोभनों को सही दिशा में ले जाने के बारे में कुछ और लिखूँगा।
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साहेब, मुझे तो पूरी राजनैतिक व्यवस्था के प्रति क्षोभ है। यह मिडियाक्रिटी और तुष्टीकरण की पोषक है और उसी माध्यम से अपना उल्लू सीधा करती है।
इसके निर्णय तर्क पर नहीं, जोड़तोड़ पर निहित होते हैं।
भारत को इनका नहीं एक विद्वतपरिषद का नेतृत्व चाहिये। वह जो वोट-बैंक के मेनीप्युलेशन से बंधी न हो।