प्रथम संशोधन

मेरा अमेरिका महान

जब भी मुझे ट्रकों के पीछे लिखा “मेरा भारत महान” का नारा नज़र आता है, एक झटका लगता है। झटका है, हैरत, नाज़, चिड़चिड़ाहट और उम्मीद से मिश्रित झटका। अपने देश पर नाज़ होने की वजह से यह उम्मीद जगती है कि कि शायद यह सच हो, पर मेरी अन्दरूनी चिड़चिड़ाहट यह मानने से इनकार कर देती है कि भारत महान है।

कई सालों तक मैंने सोचा है कि क्या कोई ऐसी चीज़ है जो भारत को महान बना सकती है? क्या कोई एक चीज़ थी – कोई नीति, कोई उसूल, कोई फ़ैसला, कोई घटना, कुछ भी – जो भारत को अपनी महानता पाने की सुहूलियत दे पाए? अगर मैं भारत को और देशों के साथ तौलूँ – सफल और असफल दोनो तरह के देशों को – तो क्या मैं पता लगा पाऊँगा कि वह एक चीज़ क्या है? धीरे धीरे मेरी सोच इस ओर बढ़ रही है कि जो चीज़ मैं खोज रहा हूँ वह वास्तव में है। मुझे लगता है कि अमेरिका में यह है और भारत में नहीं है।

सतही बराबरी

अमेरिका और भारत के बीच में समानताओं का बारंबार उल्लेख – दोनो जनतन्त्र हैं, और दोनो में विविधता है – यह समानताएँ केवल सतही हैं, और गहराई में जाने पर यह सतही ही सिद्ध होती हैं। असमानताएँ कहीं बड़ी हैं, और उन असमानताओं से साफ़ पता चलता है कि अमेरिका सफल क्यों है और भारत असफल क्यों है। मेरा मानना है कि दोनो देशों का संविधान इनकी सबसे बड़ी असमानता है। इस विषय पर मैंने पहले संक्षेप में कुछ उल्लेख किए हैं लेकिन अब इस मामले में गहराई में जा रहा हूँ – मेरी नज़र में यही भारत और अमेरिका के बीच सबसे बड़ा फ़र्क है।

अमेरिका को महान बनाने वाली चीज़ अमेरिका के संविधान का पहला संशोधन ही है:

कांग्रेस ऐसा कोई क़ानून नहीं बनाएगी जो किसी पन्थ का अनुमोदन करता हो, न ही किसी पन्थ के पालन को निषिद्ध करेने वाला कोई क़ानून बनाएगी, न ही अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, या पत्रकारों और प्रकाशकों की स्वतन्त्रता, न ही लोगों के शान्तिपूर्वक एकत्रित हो कर गोष्ठी करने की स्वतन्त्रता और न ही अपनी समस्याओं के लिए सरकार को याचिका देने के अधिकार का हनन करने वाला कोई क़ानून बनाएगी।

यह पहला संशोधन १५ दिसम्बर १७९१ को लागू हुआ। अमरीकी संविधान के पहले दस संशोधनों को बिल ऑफ़ राइट्स कहा जाता है, यह उनमें से पहला था। पहले संशोधन ने – अन्य चीज़ों के अलावा – पन्थ और राज्य के बीच एक दीवार खड़ी की। १८०२ में थॉमस जॅफ़र्सन ने इसके बारे में लिखा था, उनका मानना था:

कि पन्थ एक ऐसा मुद्दा है जो केवल किसी व्यक्ति और उसके ईश्वर के बीच का मसला है,व्यक्ति को अपनी आस्था और पूजा संबंधित राय के लिए किसी को सफ़ाई देने की ज़रूरत नहीं है, सरकार की शक्तियाँ केवल गतिविधियों पर लागू हों, राय पर नहीं, और मैं सभी अमरीकियों की ओर से सार्वभौम आदर के साथ कहता हूँ कि “विधान सभा” “ऐसा कोई क़ानून नहीं बनाएगी जो किसी पन्थ का अनुमोदन करता हो, न ही किसी पन्थ के पालन को निषिद्ध करने वाला कोई क़ानून बनाएगी” और इस प्रकार राज्यव्यवस्था और पन्थों के बीच एक दीवार होगी। [ज़ोर मेरे द्वारा जोड़ा गया]

पहला संशोधन मूलतः यह करता है कि वह किसी भी व्यक्ति को, समूहों की तानाशाही से बचाता है – राज्य की तानाशाही से भी। यह राज्य को अपना उल्लू सीधा करने के लिए व्यक्ति को नष्ट करने से रोकता है। इससे अमरीकियों को पन्थ की स्वतन्त्रता और पन्थों से स्वतन्त्रता मिलती है। इससे अमरीकियों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता मिलती है, और गोष्ठी करने की स्वतन्त्रता भी। कांग्रेस के किसी भी अधिनियम के जरिए यह अधिकार छीने नहीं जा सकते हैं।

स्पष्ट करता हूँ कि सरकार किसी अमरीकी को क्या करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती:

1. यह किसी अमरीकी को किसी खास पन्थ का समर्थन करने को नहीं कह सकती है। न ही कर द्वारा प्राप्त धन से किसी पन्थ को प्रोत्साहन दे सकती है।

2. किसी भी अमरीकी को अपने मन की बात कहने या किसी भी रूप में अपने आपको अभिव्यक्त करने से नहीं रोक सकती है।

3. किसी भी अमरीकी को शान्तिपूर्वक गोष्ठी करने से नहीं रोक सकती है।

4. किसी भी अमरीकी को सरकार पर मुक़द्दमा करने से नहीं रोक सकती है।

भारत में किसी व्यक्ति को ऐसी संवैधानिक सुरक्षा नहीं है।

1. भारत की सरकार अपने नागरिकों से कर लेती है, पन्थों को प्रचारित करने के लिए। राजनेता इस सुविधा का मत बटोरने के लिए अच्छा उपयोग करते हैं।

2. भारत की सरकार अभिव्यक्ति को रोकती है। समय समय पर किताबें प्रतिबन्धित करती है और लेखकों को परेशान करती है।

3. जब भी मत-बैंक राजनीति के तहत फ़ायदेमन्द लगता है, तब तब भारत की सरकार शान्तिपूर्क गोष्ठी करने सी भी रोकती है।

भारत में, व्यक्ति के मुकाबले सरकार अधिक शक्तिशाली है। और इस शक्ति का वह लगातार व्यक्ति के अधिकारों को छीनने के लिए करती रहती है। किसी जनतन्त्र में सरकार की शक्ति पर लगान लगाना क्यों ज़रूरी है? क्योंकि, वरना मत-बैंक की राजनीति के मिठाई पर नज़र रखते हुए सरकार लोगों को रौंदती रहती है। और जब सरकारी जूते से व्यक्ति कुचला जाता है, तो समाज आहत होता है, और समय बीतते बीतते अवश्यम्भावी नतीजा होता है गरीबी।

हाल की खबरों में

खबर: “राज्य कांग्रेस प्रमुख रमेश चेन्नितल ने केरल राज्य महिला कमीशन की अध्यक्षा न्यायमूर्ति डी श्रीदेवी को इस्तीफ़ा देने को कहा, क्योंकि उनके कमीशन ने लड़कियों को नन बनने के लिए न्यूनतम आयु निर्धारित करने की सिफ़ारिश की।”

खबर: कांग्रेस पार्टी के मुख्य मन्त्री वाई ऍस राजशेखर रेड्डी ने पुलिस को निर्देश दिए कि वे [अहमदिया] समुदाय को किसी सार्वजनिक जगह पर बैठक न करने दें क्योंकि इससे शहर में कानून और व्यव्था भङ्ग हो सकती है।

हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व में एक  प्रतिनिधि मण्डल ने सोमवार को मुख्यमन्त्री से मिल कर यह माँग रखी थी कि अहमदियों, जिन्हें क़ादियानी भी कहते हैं, को यह गोष्ठी करने की अनुमति न दी जाए।

यह विवादास्पद पन्थ शहर के बीचों बीच पब्लिक गार्डंस में अपनी गोष्ठी रखने वाला था…

प्रतिनिधिमण्डल में कई पन्थीय नेता थे, और उनका कहना था कि इस पन्थ की गतिविधियों से मुस्लिम आहत हो रहे थे, क्योंकि वह अपने आपको अहमदिया मुस्लिम कहते हैं और उन्होंने चेतावनी दी कि इस बैठक की अनुमति होने पर क़ानून और व्यवस्था की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

खबर: धर्म के आधार पर आरक्षण मूलतः उस धर्म में परिवर्तित होने के लिए एक बढ़ावा है। उदाहरण कई हैं।

खबर: हज यात्रा में रियायत। यह इन सब में से सबसे अधिक अनैतिक है। यह उन भारतीयों पर कर का बोझ डालता है जो किसी भी सूरत में इस्लाम को बढ़ावा नहीं देना चाहते हैं। यह कर शायद मुस्लिम शासकों द्वारा काफ़िरों के ऊपर लागू किए गए जज़िया से भी ज़्यादा अनैतिक है। भारत सरकार कोई इस्लामी सरकार नहीं है, इसे गैर-मुसलमानों को ऐसा कर देने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए जिसके जरिए इस्लाम की हिमायत होगी।

मेरा भारत महान नहीं है

मेरा भारत के महान होने की संभावना नहीं है, क्योंकि यहाँ पर प्रथम संशोधन के समान कुछ नहीं है। इस पहले संशोधन के न होने से, भारत सरकार आसानी से एक पन्थ को दूसरे से कभी भी भिड़ा सकती है। इससे लड़ाई होती है, और जैसे जैसे सरकार लोगों को पन्थ के नाम पर बाँटने के लिए और अग्रसर होगी, यह लड़ाई और बढ़ेगी।

अगर भारत जाग कर सरकार की शक्ति को सीमित नहीं करता है, तो भारत कभी महान नहीं हो पाएगा।

कड़ियाँ:

आज के न्यूयॉर्क टाइम्स का लेख पढ़ें: “अमेरिका बाकियों की तरह नहीं है, अभिव्यक्ति में बुरा भला कहने का अधिकार भी देता है”.

भारत और अमेरिका के संविधानों की तुलना करने वाला मेरा लेख भी देखें।

वर्णम् का पन्थनिरपेक्ष लक्ष्मण रेखा देखें, और रेश्नल फ़ूल का पन्थनिरपेक्ष भारत, दूर दूर तक नहीं भी।

मुख्यमन्त्रियों के लिए प्रार्थनाएँ का अजूबा देखें। (कश्यप पटेल को शुक्रिया।)

Original article in English

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5 Responses

  1. अमरीका महान, भले ही वो मेरा नहीं हो 🙂

    अतनु डे के विचारोत्तेजक लेखों को यहाँ अनुवादित कर प्रकाशित करने का यह स्तुत्य, वंदनीय प्रयास है.

  2. परीक्षण सफल रहा.

    बहुत सुन्दर लेख और उसका अनुवाद.

    भारत की अगली पीढी सविंधान में संशोधन करेगी ?

  3. ये काम बहुत अच्छा किया, आलोक. अतनु को मैं बराबर पढ़ता हूँ (पर देखो, अभी तक मैं उनका नाम अतानु समझता था. :)) और कुछ तुच्छ सी असहमतियों के बावजूद मुख्यतया पसंद ही करता हूँ. हिंदी में उनके विचार एक अलग, बड़ी, और ज़मीन के ज़्यादा क़रीब दुनिया तक पहुँच सकेंगे.

    क्या ही बेहतर होगा अगर अतनु हिंदी लेखों पर आई टिप्पणियों का जवाब भी दिया करें – भले ही अंग्रेज़ी में.

  4. v9y, अतनु जी टिप्पणियों का जवाब – यथोचित – भी देंगे – या तो यहीं सीधे अंग्रेज़ी में या फिर किसी अनुवादक द्वारा अनूदित हो के।

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