मध्यस्थहीनता

मुझे शुक्रिया न अदा करें। अर्थशास्त्री होने के तौर पर मेरा तो फ़र्ज़ है कि लक्ष्य तक पहुँचने के और प्रभावी रास्ते सुझाऊँ। यह है वह समस्या, जिसका मैं समाधान खोज रहा था। सिफ़ी.कॉम कह रहा है कि “आईऍसआई आतङ्कवादियों के दुगुना धन देना चाहती है।”

पाकिस्तान की इण्टर सर्विसेज़ इण्टेलिजेंस (आई ऍस आई) ने हाल ही में जम्मू और कश्मीर में आतंकी गुटों को दुगुना धन मुहैय्या कराने का प्रस्ताव किया है – भारत की बाह्य खुफ़िया एजेंसी रिसर्च ऍण्ड ऍनालिसिस विङ्ग ने एक ‘गोपनीय’ रपट में यह बताया है।

स्वाभाविक है कि यह रॉ वाली रपट तो मैंने नहीं देखी है।

प्रधानमन्त्री व अन्य अधिकारियों को भेजी रॉ रपट में लिखा है कि राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को दिए ब्यौरे में आईऍसआई ने कहा है कि जिहादी गुटों ने दृढता खो दी है, जिससे कि तथाकथित`स्वतन्त्रता संग्राम’ कमज़ोर हुआ है, और वित्तीय सीमाएँ इसका प्रमुख कारण है।

तो मुझे यही मानना पड़ेगा कि यह पैसा पाकिस्तान सरकार के जरिए पहले आईऍसआई के पास जाता है और फिर आतङ्कवादियों के पास पहुँचता है। यदि आप मुझसे पूछें तो मैं यही कहूँगा कि आतङ्कवादियों को पैसा थमाने के लिए यह काफ़ी अप्रभावी और लम्बी कड़ी है, ईश्वर ही जानता है कि रास्ते में कितना पैसा चू जाता है।

इससे भी बुरा, कभी कभी एक और कड़ी भी शामिल हो जाती है: पहले पैसा पाकिस्तानी सरकार को दिया जाता है, जो कि पैसा आईऍसआई को देती है, और फिर वह आतङ्कवादियों को देती है। उदाहरण: भारत सरकार ने २००५ में जिहादियों के लिए  पाकिस्तान सरकार को २,५०,००,००० डॉलर दिए। (वह लेख ३१ अक्तूबर, २००५ का है। उसके बाद ३ नवम्बर, और २८ नवम्बर के भी कुछ लेख हैं।)

तो मुझे यही समझ आया कि कम से कम भारत के मामले में, भारत सरकार को पाकिस्तान सरकार व आईऍसआई को जरिया बनाए बगैर सीधे आतङ्कवादियों को पैसा दे देना चाहिए।

पर फिर मुझे एक बात और ध्यान आई। वास्तव में यह पैसा तो भारतीय करदाताओं से ही आता है। पूरी कड़ी है, करदाता से भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार से आईऍसआई से आतङ्कवादी। क्यों न किसी भारतीय बैंक में आतङ्कवादियों के लिए एक खाता खोल दिया जाए जिसमें हम सब करदाता अपनी कमाई का कुछ अंश सीधे जमा करा दें, ताकि आतङ्कवादी अपनी इच्छानुसार ज़रूरत के हिसाब से पैसे निकालते रहें?

आतङ्कवादियों को पैसे देने की यह नई, चमचमाती योजना आपको कैसी लगी? है न सुन्दर, सस्ती और टिकाऊ?

पुनश्च: मैं यह लिखना भूल गया था कि भारत सरकार अफ़ग़ानिस्तान को भी पैसे भेजती रहती है। इस प्रकार भी भारत सरकार जिहादियों तक धन पहुँचाती है। आज के हिन्दुस्तान टाइम्स की यह रपट देखें: “पाकिस्तान अफ़गानी जिहादियों की मदद करगिल में चाहता था

“मुल्ला मोहम्मद रब्बानी, जो कि उस समय अफ़ग़ानी राष्ट्रपति थे… के पास पाकिस्तान से अनुरोध आया था कि वे कश्मीर जिहाद के लिए कुछ २०,०००-३०,००० “सेवक” भेजें। इसके जवाब में जब उन्होंने पाकिस्तानियों को ५,००,००० भेजने की बात कही, तो पाकिस्तानी भौंचक्क रह गए!” ५८५ पन्नों की ‘लड़ती तलवारें’ में बताते हैं, शुजा नवाज़, जिनके भाई आसिफ़ नवाज़ १९९० के दशक में फ़ौज के प्रमुख थे।

Original article in English

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