भारत पाकिस्तान के जिहादी गुटों को पैसा दे रहा है

पैसे का कोई चरित्र नहीं होता है

अगर मैंने अपने पड़ोसी को राशन खऱीदने के लिए पैसा दियातो मैंने सच्चरित्र होने का सुबूत देते हुए पड़ोसी धर्म निभायालेकिन अगर पड़ोसी शराबीनशेड़ी हो तोहो सकता है कि उसे पैसे दे के मैं उसे फ़ोकट की दारू दे रहा हूँ। मान लो कि मैं पैसे देने के बजाय खुद ही राशन खरीद लाता हूँ और सीधे उसके घर दे आता हूँतो भी उसके तो शराब के पैसे ही बचे। इससे भी बुरा। अगर मेरा पड़ोसी वास्तव में अपने घर के तहखाने में बम बनाता होऔर समय समय पर मजे लेने के लिए मेरे घर में गिरा के उसे तहस नहस करता रहता हो तोनिश्चय ही दयाभाव से ओतप्रोत हो के उसे राशन के पैसे देनेऔर मेरे ही खिलाफ़ प्रयुक्त बमों के लिए पैसे देने, दोनो सूरतों में कोई खास फ़र्क नहीं है।

यह बात तो आसानी से समझ आ जाती है नलेकिन हमारे महात्मारूपी सुचरित्र नेताओं को क्यों समझ नहीं आती हैपाकिस्तान को २,५०,००,००० अमरीकी डॉलर का दान देने का मतलब है जिहादियों को भारत में आतङ्क फैलाने के लिए कुछ पैसा देना। बात को थोड़ा और समझते हैं। भारत एक दयालु, सुचरित्र देश है। कत्रीना तूफ़ान के बाद अमरीका को भारत ने पचास लाख डॉलर भेजे थे। अब अमरीका से ८० ऍफ़-१६ खरीदने वाले देश को भारत ढाई लाख डॉलर देने जा रहा है। इन ऍफ़-१६  जहाज़ों की कीमत में लाखों गरीब पाकिस्तानियों को खिलाया पिलायासजाया धजायापढ़ाया लिखाया और आमोदित प्रमोदित किया जा सकता था। इसके बजायपाकिस्तान अपने लोगों को भूखों मरने से बचाने में इस सीमित धन का इस्तेमाल नहीं कर रहा हैबल्कि ऐसी चीज़ में खर्च कर रहा है जिससे कि ज़रूरत पड़ने पर भारत पर बम गिराए जा सकें। और तो औरपाकिस्तानियों के इस प्रण को पूरा करने में पूरी पूरी मदद करने के लिएभारत उन्हें एक ढाई करोड़ डॉलर का चेक भी भेज रहा है!

सैकड़ों सालों से धिम्मी(मुस्लिम शासकों के अधीन ग़ैर मुस्लिम प्रजा) बने रहने से ऐसा ही होता है। भारतीय मानस में धिम्मीपना कूट कूट के भरा हुआ है। आज की तारीख में जज़िया(करजो गैर-मुस्लिम प्रजा मुस्लिम शासक को देती थी) देने की कोई मजबूरी नहीं है। लेकिन पुरानी आदतें जाती कहाँ हैं। चाहें जितना छिपा लेंयह ढाई करोड़ डॉलर जज़िया ही है जो धिम्मी दे रहे हैं।

भारत में करोड़ों भूखे नङ्गे बच्चे इधर उधर कूद रहे हैं। ढाई करोड़ डॉलर की मदद से ये बच्चे कुछ इंसान की तरह जी पाते। पर अब हम पाकिस्तानी जिहादियों पर पैसे लुटा रहे हैंजो कुछ और भारतीय शहरों में बम विस्फोट करेंगे। वास्तव मेंअनन्त और अनादि काल से मूर्खता प्रदर्शित करने वालों को वही मिलता है जो उनकी अक्ल के लायक होता है।

पुनश्च ३ नवम्बर २००५: टिप्पणियों की प्रतिक्रिया स्वरूप एक और लेख यहाँ देखें।


Original article in English, 2005-10-31

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4 Responses

  1. वोटों की घटिया राजनीति ने भारत को कहीं का नहीं रखा. मनमोहन सिंह की सरकार अल्पसंख्यकवाद को एक शर्मनाक सीमा तक ले गई है. इन का बस नहीं चलता बरना धर्म के नाम पर यह हर हिंदू को एक मुसलमान परिवार का खर्चा चलाने का कानून बना दें. कभी कभी मुझे लगता है, मनमोहन और सोनिया हिन्दुओं से चिढ़ते है. इन के मन में हिन्दुओं के प्रति बस नफरत है.

  2. तार्किक, चिंतनीय और सामयिक लेख। साधुवाद।

  3. मुझे लगता है भारत अपना नाम गिनीज बुक में दर्ज करवाना चाहता है, किस बात के लिये? अरे भैय्या इस बात को गलत सिद्ध करने के लिये कि ‘ताली सिर्फ दो हाथों से बजती है’, इसे एक हाथ से भी बजाया जा सकता है।

    वैसे पहले पैराग्राफ में पड़ोसी धर्म बढे अच्छे से समझाया, इसे पढ़कर एक बात और याद आ गयी – “सांप का धर्म होता है डसना उसे कितना ही दूध क्यों ना पिला लो अंत में वो डसेगा ही” उसी तरह नेता का शायद धर्म होता हो कुर्सी पर बने रहना और फिर अब उसके लिये अगर देश बेचना।।।।।।” आगे पूरा करने की जरूरत है क्या?

    ये पैसे, डालर वाला चैक से राशन लेकर अफ्रीका में ही भेज देते तो शायद कुछ बच्चों को चंद रोज के लिये खाना नसीब हो जाता, अब घर की मुर्गी दाल बराबर होती है इसलिये अपने देश के भूखे नंगे बच्चे नजर आना थोड़ा मुश्किल है।

  4. wana talk u
    9967640645
    santosh sable

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