१२३ समझौते पर दो स्पष्ट विचार

भारत के साथ अगर अमरीका १२३ समझौते को लागू करता है तो इसका अमेरिका पर असर क्या होगा, इस बारे में खुलासा करने के लिए अमरीकी प्रशासन ने अमरीकी संसद को एक चिट्ठी भेजी थी। उस चिट्ठी का मसला हाल ही में ज़ाहिर हुआ है। उस चिट्ठी में अचरज वाली बात तो कोई नहीं है क्योंकि अमरीकी अब तक जो कहते आए हैं, वही सब उसमें लिखा है। चिट्ठी इस ओर इशारा ज़रूर करती है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या तो झूठ बोल रहे हैं या भ्रांतिग्रस्त हैं।

पायनीयर अखबार के इस लेख में भारतीय आणविक ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष पीके अय्यङ्गार ने कुछ विचार रखे हैं। उनका कहना है कि इस समझौते से भारत की नाभिकीय परीक्षण करने की आज़ादी खतरे में आ जाएगी। उनकी राय में यह समझौता करना ठीक नहीं है। नाभिकीय सशस्त्रीकरण बरकार रखने के हिसाब से यह गलत कदम है।

अरुण शूरी कहते हैं कि अमरीकी अपने १९५४ के आणविक ऊर्जा क़ानून और हाइड क़ानून के तहत ही काम करेंगे, और १२३ समझौता किसी भी तरह इन क़ानूनों के खिलाफ़ नहीं जाता है।  (मेरे पास शूरी के लेख की कड़ी नहीं है इसलिए कड़ी मिलने तक नीचे दिए उनके लेख से काम चलाएँ।)

मेरी राय है कि भारत को इस समझौते के लिए हामी नहीं भरनी चाहिए। अय्यङ्गार और शूरी की दलीलों में दम दिखता है। वैसे अगर समझौता भारत के लिए नुकसानदेह साबित होता है तो इसके हिमायतियों को आगे चल के क्या सज़ा मिलेगी? कुछ भी नहीं। सिंह साहब और उनकी मल्लिका को अपने पाप कभी भी धोने नहीं पड़ेंगे, इसके पहले भी नेताओं की मूर्खता भारत के करोड़ों लोगों पर भारी पड़ी है, पर उन नेताओं की सेहत पर भी कोई असर नहीं पड़ा है।  (बल्कि उन्हें महान और दूरदर्शी बताया गया।)

मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री जी बेवकूफ़ नहीं हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि १२३ समझौते की वजह से भारत का क्या हश्र होगा। इससे उनका बार बार यह कहना कि यह भारत के लिए अच्छा है, एक तरह की बेईमानी है। यही है भारतीय लोकतंत्र का सारांश- और इसी बात से मुझे कुछ ठंडक मिलती है – कि जनता गलत लोगों को चुनेगी तो इसका फल उन्हें ही भुगतना पड़ेगा।

फूटे करम ही हैं न?

 

“पर कुछ नया नहीं है”

अरुण शूरी

“लेकिन अभी क्यों? विएना में नाभिकीय सुरक्षा समूह की बैठक के पहले ही क्यों?” – की चीख आई।  चीख आनी ही थी: जब लोग किसी खुलासे का सामना नहीं कर पाते तो झुँझला के यही पूछते हैं, “लेकिन अभी क्यों”! इसके बजाय हमें तो आभारी होना चाहिए कि इस आखिरी घड़ी में किसी ने हमें जगा के यह बताने की कोशिश तो की कि सरकार विएना में क्या गँवाने जा रही है? क्या असलियत सामने लाने के लिए मुहूर्त निकालना होगा? वह लोग कहते हैं, “इस गोपनीय चिट्ठी का खुलासा नाभिकीय समझौते के जाने माने विरोधी ने किया है” – जैसे कि नाभिकीय समझौते के विरोधी द्वारा चिट्ठी का खुलासा करने से उस चिट्ठी की सामग्री की सच्चाई, झूठ में बदल जाएगी! और यह भी उस अखबार से जो हर हफ़्ते कुछ खुफ़िया दस्तावेज़ छापता है!

सरकार के प्रवक्ता और पत्रकारिता में सरकारी पिट्ठू कहते हैं, “लेकिन अमरीकी संसद को लिखा अमरीकी प्रशासन का यह पत्र कुछ नई बात थोड़ी करता है”। वास्तव में, यही बात इन सब चीज़ों को और बुरा बनाती है। वास्तव में अमरीकी राजदूत, मुल्फ़ोर्ड तो और भी स्पष्टवादी रहे हैं : उन्होंने कहा है कि इस चिट्ठी में जो कुछ लिखा है, उसकी चर्चा भारत सरकार से हो चुकी है। सारांश यह कि सरकार को यह सब तथ्य पहले दिन से ही मालूम थे, और फिर भी वह बार बार महीनों तक झूठ बोलती जा रही थी। अमरीकी प्रशासन की चिट्ठी और भी बहुत कुछ बताती है: हरेक बिन्दु में, चिट्ठी यह बताती है कि सरकार भारत में बार बार झूठ बोल ही रही थी, और उसे यह भी मालूम था कि हम अमरीकियों को क्या थमा रहे हैं, और उस सब से पूरी तरह सहमत भी हो गई थी।

“मिथ्या” ही सही शब्द है इसके लिए। और कुछ नहीं।

सरकार के प्रवक्ता कहते आ रहे हैं, “हाइड क़ानून हम पर लागू नहीं होता है, हम केवल १२३ समझौते के प्रति बाध्य हैं, बस।” इतना ही नहीं, इस साल २ जुलाई को भी प्रधानमन्त्री के कार्यालय ने यह कहा था “१२३ समझौता हाइड क़ानून के बजाय लागू होगा, समझौते को पढ़ो तो सही, सब स्पष्ट हो जाएगा।” यह कोरी बकवास है। १२३ समझौते की धारा २ यह स्पष्ट कहती है कि इसे लागू करते समय अन्य चीज़ों के अलावा दोनो देश अपने  “राष्ट्रीय क़ानूनों” को मद्देनज़र रखेंगे। इस मुआमले में अमरीका के राष्ट्रीय क़ानून क्या हैं?  १९५४ का आणविक ऊर्जा अधिनियम और हाइड अधिनियम। तो हाइड क़ानून लागू हुआ कि नहीं?

पर धाराओं को छोड़ दें। कोई मूरख भी यह समझ सकता है: आखिर हाइड क़ानून अमरीकियों पर लागू होता है या नहीं? हाँ होता है। अगर लागू होता है तो इस क़ानून के नतीजे लागू हो जाएँगे। मान लें कि हम नाभिकीय परीक्षण करते हैं। ऐसी स्थिति में अपने क़ानून के अधीन अमरीकियों को क्या करना होगा? हाइड क़ानून और १९५४ के आणविक ऊर्जा क़ानून के तहत अमरीकियों को भारत के साथ सारे नाभिकीय व्यवसाय बन्द करने होंगे। इन दोनों क़ानूनों और नाभिकीय विक्रेता समूह के तहत, अमरीकियों को यह निश्चित करना होगा कि नाभिकीय सुरक्षा समूह के सभी अन्य सदस्य भी भारत के साथ नाभिकीय सहयोग बन्द कर दें। सारांश यह, कि  उन पर लागू क़ानूनों के अधीन होने के नाते, अमरीकियों को हम पर पूरे पूरे प्रतिबन्ध लगाने होंगे। हमारे क़ानूनों के तहत प्रतिबन्ध नहीं लगते हैं,  पर उनके क़ानूनों के तहत लगते हैं, तो भी बात तो वही हुई न?

यही कड़वा सच १२३ समझौते में शामिल है। प्रश्न ३ में अमरीकी संसद बुश प्रशासन को पूछती है, “क्या प्रशासन यह मानता है कि भारत के साथ नाभिकीय सहयोग के समझौते और हाइड क़ानून के किसी भी प्रावधान के बीच में कोई विरोधाभास, मतभेद या असमानता होने पर यह समझौता ही सर्वोपरि है? जो प्रावधान हाइड क़ानून में नहीं हैं, पर नाभिकीय सहयोग समझौते में हैं, उन प्रावधानों के सन्दर्भ में भी यही बात लागू होगी क्या? ” जवाब में बुश प्रशासन कहता है कि १२३ समझौता “पूर्णतः हाइड क़ानून के तहत ही है,” और  “हाइड क़ानून व आणविक ऊर्जा क़ानून, दोनो द्वारा जो कुछ लाज़िमी है उसे पूरा करता ही है” – एक उदाहरण लें तो दोनो के तहत यह लाज़िमी है कि अगर भारत परीक्षण करता है तो यह समझौता तुरन्त रद्द कर दिया जाएगा, भले ही वह “शान्तिपूर्ण” ही क्यों न हो।

प्रधानमन्त्री ने बार बार यह कहा है कि सहयोग “पूर्ण” होगा, यानी नाभिकीय चक्र में होने वाली हर गतिविधि पर लागू होगा, साथ ही यह कहा है, कि भारत को “संवेदनशील तकनीकों” के बारे में पूरी जानकारी दी जाएगी। इससे अगर कुछ भी कम हुआ तो यह वह चीज़ नहीं रहेगी जो मैंने बुश जी के साथ दस्तखत किए दस्तावेज़ में लिखी थी। ऐसा बार बार कहा है, और यह भी कि इससे कम किसी चीज़ को स्वीकार नहीं किया जाएगा। मेरे जैसे लोगों ने शुरू से ही यह कहा है कि इस मामले में अमरीकी नीति बिल्कुल अटल रही है, और यह नीति बुश ने खुद और अमरीकी संसद ने भी बार बार दोहराई है – वह यह, कि भारत जैसे देशों को भारी जल के धनीकरण या परिष्कार या उत्पादन जैसी तकनीक की कोई जानकारी नहीं दी जाएगी। पर मनमोहन सिंह ने बार बार यही कहा है, “पूरा मतलब पूरा”।

और सबूत के तौर पर सरकारी प्रचारक १२३ समझौते  की धारा ५(२) का बखान करते हैं। यह धारा केवल लफ़्फ़ाज़ो लफ़्फ़ाज़ी है। यह कहती है, कि ये “संवेदनशील तकनीकें.. भारत को प्रदान की जा सकती हैं, उसके लिए इस समझौते में संशोधन करना होगा।” उसके बाद भी, यह धारा स्पष्ट कहती है कि यह स्थानान्तरण “दोनो दलों के क़ानूनों, नीतियों और अनुमितयों के तहत ही होगा”। यानी, तीन शर्तें : (क) “की जा सकती हैं”; (ख) “इस समझौते में संशोधन करना होगा”; और (ग) “दोनो दलों के क़ानूनों, नीतियों और अनुमितयों के तहत ही।” इसके बावजूद, सरकार के प्रचारक बार बार यह कह रहे हैं कि भारत को यह संवेदनशील तकनीकें प्राप्त हो गई हैं।

एक नहीं, छः सवालों (सवाल ४ से ९) के जवाब में बुश प्रशासन छः बार कहता है कि संवेदनशील तकनीकें भारत को नहीं दी जाएँगी, और इस समझौते को संशोधित करने का कोई प्रस्ताव भी नहीं है!!

इसी तरह सरकारी प्रवक्ता लगातार यह कहते आए हैं कि हमें खर्च किए ईंधन का पुनः परिष्कार करने का अधिकार दिया गया है। इतना ही नहीं, मनमोहन सिंह ने खुद कहा है कि हमें पुनः परिष्कार करने का अधिकार इस हद तक स्वीकारा गया है कि यह अधिकार “स्थायी” हैं। सवाल २६ व २९, और १२३ समझौते की धारा ११ व १२ भी खुद यह कहती हैं कि हम खर्च ईंधन का पुनः परिष्कार इन्हीं सूरतों में कर पाएँगे: (क) अपने खर्चे पर; (ख) आईएईए के अधीन रहते हुए; (ग) केवल अमरीका द्वारा स्वीकृत “बंदोबस्त और तौर तरीकों” के तहत। जहाँ तक इस अधिकार के “स्थायी” हो जाने की बात है, तो यह झूठ प्रश्न ४४ से सामने आ जाता है। यह जवाब यह तो दुबारा कहता ही है कि पुनः परिष्कार के “बंदोबस्त और तौर तरीकों” की स्वीकृति अमरीका से लेनी होगी, वह इतना भी कहता है कि  “भारत के साथ प्रस्तावित बन्दोबस्त और तौर तरीकों में पुनः परिष्कार की स्वीकृित रद्द करने का प्रावधान भी होगा।  हो गया स्थायी?

मनमोहन सिंह लगातार यह कहते आए हैं कि भारत कोई देख रेख या निगरानी स्वीकार नहीं करेगा। सिवाय अपनी आईएईए के साथ “भारत संबंधी संरक्षण” के तहत जो भी आता है, और कुछ नहीं। मेरे जैसे लोगों ने कॉण्डोलीज़ा राइस की कड़क और बिल्कुल स्पष्ट बातों की ओर ध्यान खींचा; अमरीकी संसद की संयुक्त समिति की रपट की ओर भी; हाइड कॉनून के प्रावधानों की ओर भी, जो स्पष्ट रूप से यह कहते हैं कि भारत को “इतर संरक्षण” स्वीकार करना होगा – यानी, अगर आईएईए या अमरीका ये सोचते हैं कि आईएईए अपने निरीक्षण ठीक से नहीं कर पा रहे हैं, तो अमरीका को निरीक्षण करने व  दूसरी संस्थाओं के जरिए निगरानी के और तरीके अपनाने का अधिकार होगा – अपनी संस्थाओं के जरिए या फिर अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के जरिए। मनमहोन सिंह की सरकार ने १२३ समझौते की धारा १० व १६(३) के तहत इन अतिरिक्त निरीक्षणों और बन्धनों को स्वीकार किया, पर ऐलान यह किया कि ऐसा कुछ होगा ही नहीं। बस, अमरीकी निरीक्षकों को “निरीक्षक”  कहने के बजाय “विशेषज्ञ” कहा गया। इन धाराओं के तहत भारत ने इन लोगों को उन सभी इलाकों और जानकारियों के निरीक्षण का अधिकार दे दिया है।

सवाल १० से १३ के जवाब में अमरीकी प्रशासन ने चार बार कहा है कि हाँ, अतिरिक्त प्रतिबन्ध और निरीक्षण भी होंगे। इतना ही नहीं प्रशासन अमरीकी संसद को यह भी कहता है कि अनन्त काल तक आईएईए के बचाव और निरीक्षण को स्वीकार करके भारत की सरकार  “यह अच्छी तरह समझती है कि समझौते की धारा १० के पहले अनुच्छेद का यह मतलब कतई नहीं है कि  कभी भी एजेंसी (यानी, आईएईए) के प्रतिबन्ध हट जाएँगे, वह तो रहेंगे ही।” अर्थात् – हमें एकदम उल्टी बात बताई जा रही है – “हम अमरीकी निरीक्षकों को अपने इलाके में खुली छूट नहीं देने वाले” – जबकि मनमोहन सिंह की सरकार ने इसी खुली छूट को स्वीकार कर लिया था।

मनमोहन सिंह और उनके प्रवक्ताओं ने कई बार कहा है कि अमरीका ने भारत को “व्यवधानरहित ईंधन” प्रदान करने का वादा किया है। इसके सबूत के तौर पर वे १२३ समझौते की धारा ५(६) की बात करते हैं। मैंने उसी समय यह कहा था कि यह धारा केवल बहकावा है। मनमोहन सिंह ने संसद को कहा था कि वे “व्यवधानरहित ईंधन” की सुविधा सुनिश्चित करेंगे, और यह १२३ समझौते में शामिल किया जाएगा। लेकिन, अमरीकी एक इंच भी नहीं हिले हैं। १२३ समझौते में ऐसा कुछ भी डालने से उन्होंने इनकार कर दिया। अन्त में मनमोहन सिंह सरकार की इज़्ज़त बचाने के लिए उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार के कथन की नकलचिप्पी इसमें शामिल कर दी कि १२३ समझौते में यह आश्वासन शामिल किया जाएगा। लेकिन यही तो १२३ समझौता है! १२३ समझौते में जो शामिल करना था, वह भविष्य के किसी १२३ समझौते के लिए छोड़ दिया गया है!

फिर भी, यहाँ पर लोगों को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश की गई – कि हमने अमरीकियों से “निरन्तर ईंधन प्रदान” करने का वादा ले लिया है। इतना ही नहीं, यह भी कहा गया कि किसी भी सूरत में ईंधन प्रदान करना बन्द किया ही नहीं जा सकता।  सवाल १५ और फिर सवाल १८ में अमरीकी सरकार यह कहती है कि अगर ईंधन प्रदान करने को बन्द करने के पीछे भारत की कोई गलती नहीं है, तभी अमरीका इसे फिर शुरू करने में मदद करेगा। अतः अगर कोई अमरीकी कंपनी ईंधन प्रदान करने में अक्षम हो जाती है, या वैश्विक बाज़ार में कुछ गड़बड़ी हो जाती है, तो अमरीका इसे शुरू करने में मदद करेगा। लेकिन, मान लें कि हम परीक्षण करते हैं; या हम अपनी यूरेनियम के आयात, खनन और इस्तेमाल का ब्यौरा देने में देर करते हैं: या १२३ समझौते, हाइड क़ानून, आईएईए के समझौते या ऍनऍसजी के निर्देशों का उल्लङ्घन करते हैं, और इनकी बदौलत ईंधन बन्द किया जाता है, तो अमरीका खासतौर पर ईंधन प्रदान करने के लिए आगे नहीं आने वाला।

इसी तरह हमें यह कहानी सुनाई गई है कि अमरीका ने  ईंधन के “सामरिक संचय” में मदद करने की सहमति दी है ताकि तारापुर का अनुभव दुबारा न हो। लेकिन इस दस्तावेज़ में दो बार – सवाल १९ और २० के जवाब में – हम यह पाते हैं कि ऐसा कोई आश्वासन है ही नहीं। हाइड क़ानून के ओबामा संशोधन के तहत, भारत ईंधन का संचय केवल  “मुनासिब प्रचालन की ज़रूरतों” के लिए कर सकता है। इतना ही नहीं, जवाब यह भी बताते हैं कि   – “मुनासिब प्रचालन की ज़रूरतों” – का वास्तव में मतलब क्या है, यह भी साफ़ नहीं है!

मनमोहन सिंह ने बार बार कहा है कि अगर ईंधन बन्द होता है या कोई और दिक्कतें पैदा की जाती हैं तो भारत को “उचित कदम” उठाने का अधिकार है। पर यह है क्या? हमने जानने की कोशिश तो की है पर जवाब कुछ नहीं आया है। अमरीकी संसद ने भी बुश के अधिकारियों से यही पूछा है। भारत के प्रधानमन्त्री के यह “उचित कदम” क्या हैं? बताया तो यह गया है, कि अगर सब कुछ ठीक नहीं चलता है तो हम अपने  रिऍक्टरों के निरीक्षण के लिए मनाही कर सकते हैं।

२५वें और ४२वें सवाल के जवाब से पता चलता है कि यह सिर्फ़ कोरी गप्प ही है। भारत की सरकार ने यह नहीं बताया है कि यह है क्या, ऐसा अमरीकी सरकार का कहना है। हम यह उम्मीद करते हैं कि भारत समझौते को पूरी तरह लागू करेगा, अतः निरीक्षण व रोकटोक “चिरकाल” के लिए होगी। इतना ही नहीं, अमरीकी सरकार उन्हीं शब्दों के इस्तेमाल के बारे में कहती है, जिनकी ओर मेरे जैसे लोगों ने संसद में ध्यान इंगित किया था, सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट कॉण्डोलीज़ा राइस ने अमरीकी संसद को कहा है कि  “हिन्दुस्तानियों को हमने साफ़ कहा है कि रोकटोक की चिरकालिकता का मतलब है बिना किसी शर्ते के रोकटोक की चिरकालिकता।

१२३ समझौता सार्वजनिक होने के बाद मैंने धारा १६ की ओर ध्यान खींचा था। यह कहता है कि अगर अमरीका के हिसाब से अगर भारत अपने वादे नहीं निभा रहा है, या यह समझौता रद्द हो जाता है, या इसका समय समाप्त हो जाता है, या भारत इसे मानने से मना कर देता है, तो भी अमरीका को इस समझौते के अधीन प्रदत्त सभी नाभिकीय, और गैर नाभिकीय सामग्री वापस पाने का अधिकार है, एक एक ग्राम ईंधन वापस माँगने का अधिकार है। यही बात सवाल ४१ और ४२ के जवाबों में फिर से कही गई है।

मनमोहन सिंह बार बार यह कह रहे हैं, और साथ ही पिट्ठू पत्रकार भी, कि भारत का परीक्षण का अधिकार जस का तस बरकरार है। अमरीकी संसद और अमरीकी सरकार ने कई बार बिल्कुल साफ़ साफ़ कहा है कि जैसे ही भारत कोई परीक्षण करता है, भले ही शान्ति के मकसद से ही, १२३ समझौता रद्द समझा जाएगा, और सभी नाभिकीय व्यापार समाप्त। यह सब तुरन्त होगा। यह बात इस दस्तावेज़ में चार बार कही गई है – सवाल १६, १७, ३७ और ३८ के जवाबों में। 

पर केवल परीक्षणों के बारे में ही सरकार ने झूठ नहीं बोला है। इन जवाबों से दो बातें और साफ़ हो रही हैं। पहली यह कि भारत द्वारा परीक्षण ही नहीं, और भी कई कारणों से यह समझौता और नाभिकीय व्यवसाय रद्द किया जा सकता है। वे कारण हैं “१२३ समझौते का उल्लंघन, या अन्तर्राष्ट्रीय आणविक ऊर्जा संस्था की रोकटोक का उल्लंघन”। और इन जवाबों की भूमिका में यह शब्द हैं: “उदाहरण के लिए“। दूसरा, सवाल ३८ का जवाब यह बताता है कि १२३ समझौते की धारा १४ भी यही कहती है और अमरीका के साथ साथ भारत भी इसको बखूबी समझता है।

आखिरी वार किया है आखिरी सवाल – ४५ – के जवाब ने, और यह बताता है कि मनमोहन सिंह सरकार कैसे सफ़ेद झूठ बोल रही है। सरकार यह कहती आई है कि अगर भारत के साथ नाभिकीय व्यापार बन्द होता है तो अमरीकी सरकार ने वादा किया है कि वह ऍनऍसजी के अन्य सदस्यों से रसद दिलाने में भारत की मदद करेगी। इस तरह का दावा यही सोच के किया गया होगा कि सुनने वाले बेवकूफ़ हैं। लेकिन यह दावा किया ही नहीं गया, सुनने वालों ने इसे गले भी उतार लिया, और पत्रकारिता के कई वर्गों में इसे अच्छी तरह फैलाया भी गया।

हाइड क़ानून के अधीन अमरीकी सरकार इसका बिलकुल उलट करने को बाध्य है – यानी, अगर वह १२३ समझौते को रद्द करता है, और भारत के साथ नाभिकीय व्यवसाय बन्द करता है, तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भारत ऍनऍसजी के किसी और सदस्य से भी यह रसद न ले पाए। सवाल ४५ के जवाब में यही बात दोहराई गई है, और अमरीकी सरकार की ज़िम्मेदारी के बारे में यही बात फिर से कही गई है। अमरीकी सरकार ने यह भी संसद से कहा है कि ऍनऍसजी में कुछ निर्देश पहले ही मौजूद हैं, और अगर अमरीका भारत से साथ नाभिकीय व्यवसाय बन्द करता है, तो यह निर्देश निश्चित रूप से लागू होंगे।

अमरीकी सरकार के अनुसार, ऍनऍसजी के निर्देशों का अनुच्छेद १६ यह कहता है कि  “(१) अगर एक या अधिक विक्रेता यह समझते हैं कि समझौते का उल्लङ्घन हुआ है तो विक्रेताओं को आपस में सलाह करनी चाहिए (२) ऐसा कोई कदम न उठाएँ जिससे उल्लङ्घन के नतीजन उठाए कदम के साथ विरोधाभास हो; और (३) ‘उचित प्रतिक्रिया और संभव कार्यवाही’ पर सहमति हो, जिसमें उस प्राप्तकर्ता को नाभिकीय सामग्री देने पर पाबन्दी भी शामिल हो सकती है। ” अगर ऍनऍसजी भारत के लिए इस अपवाद को मान लेती है, तो भी अमरीकी सरकार का आश्वासन है कि यह नीति ही  “नाभिकीय विक्रेता समूह के किसी और सदस्य द्वारा भारत को सामग्री प्रदान करने पर भी लागू होगी।”

फिर भी झूठ बोले जा रहे हैं।

नाभिकीय समझौता अब दो पाप के घड़ों में बन्द है। मतों की खरीदफ़रोख्त का पाप। और यह झूठ का घड़ा।

मैं बस बहुत अपने हृदय में दुःख समेटे, पत्रकारों को यही कह सकता हूँ: इस तरह के झूठ को फैलाने में सहयोग न दें

– अरण शूरी, ६ सित. २००८

Original Article in English

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