हिंदुस्तान में नायब ईजाद और धंधे में अगुआई

अमरीका नायाबी का देश है

अमरीका की माली हालत बहुत अच्छी होने का सीधा सीधा ताल्लुक उसके धंधेबाज़ लोगों की अगुवाई से किया जाता है। इनकी वजह से ही वहाँ लगातार नायाब ईजाद होते रहते हैं। यह भी कहा जा सकता है कि दोनो ही एक दूसरे के वजह से हैं – नायाब चीज़ें ज़्यादा होती हैं तो माली हालत भी बेहतर होती है, और ज़्यादा माल हाथ आने पर नायाब ईजादों का और इज़ाफ़ा होता है। बल्कि यह पता लगाना ही मुश्किल है कि पहले मुर्गी आई या अंडा – माली हालत अच्छी होने की वजह से धंधे में अगुआई की तमन्ना ज़्यादा है या अगुआई की वजह से माली हालत अच्छी हुई।

यह भी माना जाता है कि हिंदुस्तान नायाब ईजादों और धंधे में अगुआई में फ़िसड्डी है। पर ऐसा है क्यों? मेरे अंदाज़ा है – और अंदाज़ा भर ही है – कि ऐसा इसलिए है कि हिंदुस्तान माली हालत सुधारने की दौड़ में काफ़ी देर से उतरा है।

अमरीका के मुकाबले हिंदुस्तान की माली हालत काफ़ी खस्ता है। अमरीका ने अपने ३० करोड़ शहरियों के लिए रहन सहन की आम दिक्कते सुलझाई हुई हैं। खाना, रहना, पढ़ना, दवा-दारू वगैरह। हर शहरी की औसत सालाना कमाई ४७,००० डॉलर है।

हिंदुस्तान की उतनी ही आबादी

हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था गुज़र बसर के लिए लुढ़कती पड़कती अर्थव्यवस्था है। अपने १ अरब १० करोड़ शहरिओं को कमतर से कमतर ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भी खींचातानी से काम चलाना पड़ता है। हिंदुस्तान में हर शहरी की औसत सालाना कमाई ९४० डॉलर है, यानी अमरीका की २ फ़ीसदी। और यह औसत है, ज़मीनी तौर पर सबसे कम और सबसे ज़्यादा कमाई करने वालों में बहुत बड़े फ़र्क हैं। कुछ ८ करोड़ हिंदुस्तानियों की कमाई दिन की २ डॉलर से भी कम है, और करीब ५० करोड़ की दिहाड़ी १ डॉलर से भी कम है।

जो लोग किसी तरह रो पिट के बस खाने पीने का जुगा़ड़ भर कर पा रहे हों, उनसे नायाब तरीके अपनाने और धंधे में अगुआई करने की उसी तरह की उम्मीद कतई नहीं की जा सकती जिस तरह जोखिम भरे लेकिन बहुत अच्छे नतीजे लाने वाले काम करने की उम्मीद माली हालत अच्छी होने पर की जा सकती है।

जिन ३० करोड़ हिंदुस्तानियों की दिहाड़ी २ डॉलर से ज़्यादा की है, मान लेते हैं कि उनमें से १० फ़ीसदी की कमाई इतनी है कि वह औसत अमरीकी की तरह की ज़िंदगी जी सकते हैं। मतलब यह हुआ की करीब ३ करोड़ हिंदुस्तानियों में वह काबिलियत और जुनून हो सकता है जो अमरीकियों के धंधे में अगुआई और नायाब तरीके अपनाने के जैसा हो। यानी हम दो अर्थव्यवस्थाओं को आमने सामने रख रहे हैं – ३० करोड़ लोगों वाला अमरीका और ३ करोड़ लोगों वाला हिंदुस्तान। यानी दस गुना का फ़र्क।

काबिलियत और जुनून

किसी भी काम को करने के लिए तीन चीज़ें चाहिए: काबिलियत, जुनून और मौका। पहले देखते हैं कि जिन ३ करोड़ लोगों को नायब ईजाद करने और धंधे में अगुआई करने की काबिलित है, उनको क्या मौके मिल रहे हैं यह सब करने के लिए।

ये ३ करोड़ हिंदुस्तानी जिस माहौल में रहते हैं वह ३० करोड़ अमरीकियों के माहौल से बहुत अगल है। दोनो माहौलों में जो दिक्कते पेश आती हैं वो एक दूसरे से एकदम जुदा हैं।

हिंदुस्तानी माहौल में ज़रूरत है ठोकी बजाई तरकीबों को अमल में लाने की। मसला अनजानी सरहदों को पार करने का नहीं है बल्कि जानी पहचानी तरकीबों को लागू करने का है। हिंदुस्तान को जो दिक्कते हैं उन्हें सुलझाने के लिए पैनी धार वाले औज़ारों और ईजादों की ज़रूरत नहीं है। जवाब सबके पास हैं, और सब उन्हें समझते हैं। इन ३ करोड़ लोगों को काम में लगाए रखने के लिए इन जानी पहचानी तरकीबों को बस लागू करने का काम देना है। यह पका पकाया माल है, और लोग इसी पके पकाए माल को उड़ाते रहते हैं, बशर्ते कि उनकी ‘साम्राज्यवादी’ सरकार इजाज़त दे।

(मैं इतना बेवकूफ़ नहीं हूँ कि यह गुमान न हो कि बरतानिया के साम्राज्यवादी यहाँ से जा चुके हैं। बात इतनी सी है कि बरतानिया के साम्राज्यवादी सियासियों और आज़ादी के बाद के सियासियों में मुझे कुछ खास फ़र्क नहीं दिखता।)

मौका

अमरीका के सामने जो दिक्कते हैं उन्हें सुलझाने कि लिए नायाब सोच की ज़रूरत है क्योंकि पका पकाया माल बहुत पहले ही उड़ाया जा चुका है। उन्हें और माल नहीं चाहिए, बल्कि जो माल उनके पास है उसकी और बेहतरी चाहिए। सबके पास फ़ोन है, अब उन्हें बेहतर फ़ोन चाहिए। उन्हें सरहद की हद बढ़ानी है क्योंकि उनके ज़्यादातर लोग सरहद पर पहुँच चुके हैं। उन्हें नायाब चीज़ें बनानी हैं क्योंकि कल को जिस चीज़ की ज़रूरत है उसे नायाब होना ही चाहिए, जो बन चुका है वह सबके पास पहले से ही है।

हिंदुस्तानियों के पास नायाब ईजाद करने का मौका इसलिए नहीं है क्योंकि हिंदुस्तान को नायाबी करने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि पहले से ही मालूम ईजादों को लागू करने की ज़रूरत है। और वह करते भी हैं। अमरीका में हिंदुस्तानी नायाब जितने हैं उससे कम हिंदुस्तानी नायाब हिंदुस्तान में हैं – क्योंकि अमरीका में नायाबी की माँग ज़्यादा है।

हिंदुस्तानी धंधेबाज़ अमरीकियों की तरह नायाबी करना कब शुरू करेंगे? जब हिंदुस्तान गुज़र बसर की अर्थव्यवस्था के बजाय कुछ बेहतर बनेगी तब। और वह कब होगा? जब हिंदस्तान सभी मालूम ईजादों को लागू कर चुकेगा, तब। तब गुज़र बसर के ऊपर उठेगा हिंदुस्तान। और तभी हिंदुस्तान में नायाब ईजादों के लिए वही मौके रहेंगे, हिंदुस्तानी धंधेबाज़ों के लिए भी वही मौके रहेंगे (उनकी गिनती उस समय कितनी होगी, यह पता नहीं), जो अमरीकियों के पास अब हैं।

यह लेख श्रमण मित्र के लेख भारत में नायाबी की कमी में उठाए सवाल के जवाब के तौर पर पढ़ा जाए।

Original article in English

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One Response

  1. अतनु जी,
    आपका यह लेख मैने अंग्रेजी मे पढ़ा था। विचार बहुत सम्यक लगे।
    हिन्दी में भी लिखना आरम्भ करने के लिये साधुवाद। हिन्दी में विकास सम्बन्धी अच्छे लेखों की कमी थी। आपके आने से इस कमी की पूर्ति होगी।

    स्वागतम् !

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