हिंदुस्तान में नायब ईजाद और धंधे में अगुआई

अमरीका नायाबी का देश है

अमरीका की माली हालत बहुत अच्छी होने का सीधा सीधा ताल्लुक उसके धंधेबाज़ लोगों की अगुवाई से किया जाता है। इनकी वजह से ही वहाँ लगातार नायाब ईजाद होते रहते हैं। यह भी कहा जा सकता है कि दोनो ही एक दूसरे के वजह से हैं – नायाब चीज़ें ज़्यादा होती हैं तो माली हालत भी बेहतर होती है, और ज़्यादा माल हाथ आने पर नायाब ईजादों का और इज़ाफ़ा होता है। बल्कि यह पता लगाना ही मुश्किल है कि पहले मुर्गी आई या अंडा – माली हालत अच्छी होने की वजह से धंधे में अगुआई की तमन्ना ज़्यादा है या अगुआई की वजह से माली हालत अच्छी हुई।

यह भी माना जाता है कि हिंदुस्तान नायाब ईजादों और धंधे में अगुआई में फ़िसड्डी है। पर ऐसा है क्यों? मेरे अंदाज़ा है – और अंदाज़ा भर ही है – कि ऐसा इसलिए है कि हिंदुस्तान माली हालत सुधारने की दौड़ में काफ़ी देर से उतरा है।

अमरीका के मुकाबले हिंदुस्तान की माली हालत काफ़ी खस्ता है। अमरीका ने अपने ३० करोड़ शहरियों के लिए रहन सहन की आम दिक्कते सुलझाई हुई हैं। खाना, रहना, पढ़ना, दवा-दारू वगैरह। हर शहरी की औसत सालाना कमाई ४७,००० डॉलर है।

हिंदुस्तान की उतनी ही आबादी

हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था गुज़र बसर के लिए लुढ़कती पड़कती अर्थव्यवस्था है। अपने १ अरब १० करोड़ शहरिओं को कमतर से कमतर ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भी खींचातानी से काम चलाना पड़ता है। हिंदुस्तान में हर शहरी की औसत सालाना कमाई ९४० डॉलर है, यानी अमरीका की २ फ़ीसदी। और यह औसत है, ज़मीनी तौर पर सबसे कम और सबसे ज़्यादा कमाई करने वालों में बहुत बड़े फ़र्क हैं। कुछ ८ करोड़ हिंदुस्तानियों की कमाई दिन की २ डॉलर से भी कम है, और करीब ५० करोड़ की दिहाड़ी १ डॉलर से भी कम है।

जो लोग किसी तरह रो पिट के बस खाने पीने का जुगा़ड़ भर कर पा रहे हों, उनसे नायाब तरीके अपनाने और धंधे में अगुआई करने की उसी तरह की उम्मीद कतई नहीं की जा सकती जिस तरह जोखिम भरे लेकिन बहुत अच्छे नतीजे लाने वाले काम करने की उम्मीद माली हालत अच्छी होने पर की जा सकती है।

जिन ३० करोड़ हिंदुस्तानियों की दिहाड़ी २ डॉलर से ज़्यादा की है, मान लेते हैं कि उनमें से १० फ़ीसदी की कमाई इतनी है कि वह औसत अमरीकी की तरह की ज़िंदगी जी सकते हैं। मतलब यह हुआ की करीब ३ करोड़ हिंदुस्तानियों में वह काबिलियत और जुनून हो सकता है जो अमरीकियों के धंधे में अगुआई और नायाब तरीके अपनाने के जैसा हो। यानी हम दो अर्थव्यवस्थाओं को आमने सामने रख रहे हैं – ३० करोड़ लोगों वाला अमरीका और ३ करोड़ लोगों वाला हिंदुस्तान। यानी दस गुना का फ़र्क।

काबिलियत और जुनून

किसी भी काम को करने के लिए तीन चीज़ें चाहिए: काबिलियत, जुनून और मौका। पहले देखते हैं कि जिन ३ करोड़ लोगों को नायब ईजाद करने और धंधे में अगुआई करने की काबिलित है, उनको क्या मौके मिल रहे हैं यह सब करने के लिए।

ये ३ करोड़ हिंदुस्तानी जिस माहौल में रहते हैं वह ३० करोड़ अमरीकियों के माहौल से बहुत अगल है। दोनो माहौलों में जो दिक्कते पेश आती हैं वो एक दूसरे से एकदम जुदा हैं।

हिंदुस्तानी माहौल में ज़रूरत है ठोकी बजाई तरकीबों को अमल में लाने की। मसला अनजानी सरहदों को पार करने का नहीं है बल्कि जानी पहचानी तरकीबों को लागू करने का है। हिंदुस्तान को जो दिक्कते हैं उन्हें सुलझाने के लिए पैनी धार वाले औज़ारों और ईजादों की ज़रूरत नहीं है। जवाब सबके पास हैं, और सब उन्हें समझते हैं। इन ३ करोड़ लोगों को काम में लगाए रखने के लिए इन जानी पहचानी तरकीबों को बस लागू करने का काम देना है। यह पका पकाया माल है, और लोग इसी पके पकाए माल को उड़ाते रहते हैं, बशर्ते कि उनकी ‘साम्राज्यवादी’ सरकार इजाज़त दे।

(मैं इतना बेवकूफ़ नहीं हूँ कि यह गुमान न हो कि बरतानिया के साम्राज्यवादी यहाँ से जा चुके हैं। बात इतनी सी है कि बरतानिया के साम्राज्यवादी सियासियों और आज़ादी के बाद के सियासियों में मुझे कुछ खास फ़र्क नहीं दिखता।)

मौका

अमरीका के सामने जो दिक्कते हैं उन्हें सुलझाने कि लिए नायाब सोच की ज़रूरत है क्योंकि पका पकाया माल बहुत पहले ही उड़ाया जा चुका है। उन्हें और माल नहीं चाहिए, बल्कि जो माल उनके पास है उसकी और बेहतरी चाहिए। सबके पास फ़ोन है, अब उन्हें बेहतर फ़ोन चाहिए। उन्हें सरहद की हद बढ़ानी है क्योंकि उनके ज़्यादातर लोग सरहद पर पहुँच चुके हैं। उन्हें नायाब चीज़ें बनानी हैं क्योंकि कल को जिस चीज़ की ज़रूरत है उसे नायाब होना ही चाहिए, जो बन चुका है वह सबके पास पहले से ही है।

हिंदुस्तानियों के पास नायाब ईजाद करने का मौका इसलिए नहीं है क्योंकि हिंदुस्तान को नायाबी करने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि पहले से ही मालूम ईजादों को लागू करने की ज़रूरत है। और वह करते भी हैं। अमरीका में हिंदुस्तानी नायाब जितने हैं उससे कम हिंदुस्तानी नायाब हिंदुस्तान में हैं – क्योंकि अमरीका में नायाबी की माँग ज़्यादा है।

हिंदुस्तानी धंधेबाज़ अमरीकियों की तरह नायाबी करना कब शुरू करेंगे? जब हिंदुस्तान गुज़र बसर की अर्थव्यवस्था के बजाय कुछ बेहतर बनेगी तब। और वह कब होगा? जब हिंदस्तान सभी मालूम ईजादों को लागू कर चुकेगा, तब। तब गुज़र बसर के ऊपर उठेगा हिंदुस्तान। और तभी हिंदुस्तान में नायाब ईजादों के लिए वही मौके रहेंगे, हिंदुस्तानी धंधेबाज़ों के लिए भी वही मौके रहेंगे (उनकी गिनती उस समय कितनी होगी, यह पता नहीं), जो अमरीकियों के पास अब हैं।

यह लेख श्रमण मित्र के लेख भारत में नायाबी की कमी में उठाए सवाल के जवाब के तौर पर पढ़ा जाए।

Original article in English

१२३ समझौते पर दो स्पष्ट विचार

भारत के साथ अगर अमरीका १२३ समझौते को लागू करता है तो इसका अमेरिका पर असर क्या होगा, इस बारे में खुलासा करने के लिए अमरीकी प्रशासन ने अमरीकी संसद को एक चिट्ठी भेजी थी। उस चिट्ठी का मसला हाल ही में ज़ाहिर हुआ है। उस चिट्ठी में अचरज वाली बात तो कोई नहीं है क्योंकि अमरीकी अब तक जो कहते आए हैं, वही सब उसमें लिखा है। चिट्ठी इस ओर इशारा ज़रूर करती है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या तो झूठ बोल रहे हैं या भ्रांतिग्रस्त हैं।

पायनीयर अखबार के इस लेख में भारतीय आणविक ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष पीके अय्यङ्गार ने कुछ विचार रखे हैं। उनका कहना है कि इस समझौते से भारत की नाभिकीय परीक्षण करने की आज़ादी खतरे में आ जाएगी। उनकी राय में यह समझौता करना ठीक नहीं है। नाभिकीय सशस्त्रीकरण बरकार रखने के हिसाब से यह गलत कदम है।

अरुण शूरी कहते हैं कि अमरीकी अपने १९५४ के आणविक ऊर्जा क़ानून और हाइड क़ानून के तहत ही काम करेंगे, और १२३ समझौता किसी भी तरह इन क़ानूनों के खिलाफ़ नहीं जाता है।  (मेरे पास शूरी के लेख की कड़ी नहीं है इसलिए कड़ी मिलने तक नीचे दिए उनके लेख से काम चलाएँ।)

मेरी राय है कि भारत को इस समझौते के लिए हामी नहीं भरनी चाहिए। अय्यङ्गार और शूरी की दलीलों में दम दिखता है। वैसे अगर समझौता भारत के लिए नुकसानदेह साबित होता है तो इसके हिमायतियों को आगे चल के क्या सज़ा मिलेगी? कुछ भी नहीं। सिंह साहब और उनकी मल्लिका को अपने पाप कभी भी धोने नहीं पड़ेंगे, इसके पहले भी नेताओं की मूर्खता भारत के करोड़ों लोगों पर भारी पड़ी है, पर उन नेताओं की सेहत पर भी कोई असर नहीं पड़ा है।  (बल्कि उन्हें महान और दूरदर्शी बताया गया।)

मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री जी बेवकूफ़ नहीं हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि १२३ समझौते की वजह से भारत का क्या हश्र होगा। इससे उनका बार बार यह कहना कि यह भारत के लिए अच्छा है, एक तरह की बेईमानी है। यही है भारतीय लोकतंत्र का सारांश- और इसी बात से मुझे कुछ ठंडक मिलती है – कि जनता गलत लोगों को चुनेगी तो इसका फल उन्हें ही भुगतना पड़ेगा।

फूटे करम ही हैं न?

 

“पर कुछ नया नहीं है”

अरुण शूरी

“लेकिन अभी क्यों? विएना में नाभिकीय सुरक्षा समूह की बैठक के पहले ही क्यों?” – की चीख आई।  चीख आनी ही थी: जब लोग किसी खुलासे का सामना नहीं कर पाते तो झुँझला के यही पूछते हैं, “लेकिन अभी क्यों”! इसके बजाय हमें तो आभारी होना चाहिए कि इस आखिरी घड़ी में किसी ने हमें जगा के यह बताने की कोशिश तो की कि सरकार विएना में क्या गँवाने जा रही है? क्या असलियत सामने लाने के लिए मुहूर्त निकालना होगा? वह लोग कहते हैं, “इस गोपनीय चिट्ठी का खुलासा नाभिकीय समझौते के जाने माने विरोधी ने किया है” – जैसे कि नाभिकीय समझौते के विरोधी द्वारा चिट्ठी का खुलासा करने से उस चिट्ठी की सामग्री की सच्चाई, झूठ में बदल जाएगी! और यह भी उस अखबार से जो हर हफ़्ते कुछ खुफ़िया दस्तावेज़ छापता है!

सरकार के प्रवक्ता और पत्रकारिता में सरकारी पिट्ठू कहते हैं, “लेकिन अमरीकी संसद को लिखा अमरीकी प्रशासन का यह पत्र कुछ नई बात थोड़ी करता है”। वास्तव में, यही बात इन सब चीज़ों को और बुरा बनाती है। वास्तव में अमरीकी राजदूत, मुल्फ़ोर्ड तो और भी स्पष्टवादी रहे हैं : उन्होंने कहा है कि इस चिट्ठी में जो कुछ लिखा है, उसकी चर्चा भारत सरकार से हो चुकी है। सारांश यह कि सरकार को यह सब तथ्य पहले दिन से ही मालूम थे, और फिर भी वह बार बार महीनों तक झूठ बोलती जा रही थी। अमरीकी प्रशासन की चिट्ठी और भी बहुत कुछ बताती है: हरेक बिन्दु में, चिट्ठी यह बताती है कि सरकार भारत में बार बार झूठ बोल ही रही थी, और उसे यह भी मालूम था कि हम अमरीकियों को क्या थमा रहे हैं, और उस सब से पूरी तरह सहमत भी हो गई थी।

“मिथ्या” ही सही शब्द है इसके लिए। और कुछ नहीं।

सरकार के प्रवक्ता कहते आ रहे हैं, “हाइड क़ानून हम पर लागू नहीं होता है, हम केवल १२३ समझौते के प्रति बाध्य हैं, बस।” इतना ही नहीं, इस साल २ जुलाई को भी प्रधानमन्त्री के कार्यालय ने यह कहा था “१२३ समझौता हाइड क़ानून के बजाय लागू होगा, समझौते को पढ़ो तो सही, सब स्पष्ट हो जाएगा।” यह कोरी बकवास है। १२३ समझौते की धारा २ यह स्पष्ट कहती है कि इसे लागू करते समय अन्य चीज़ों के अलावा दोनो देश अपने  “राष्ट्रीय क़ानूनों” को मद्देनज़र रखेंगे। इस मुआमले में अमरीका के राष्ट्रीय क़ानून क्या हैं?  १९५४ का आणविक ऊर्जा अधिनियम और हाइड अधिनियम। तो हाइड क़ानून लागू हुआ कि नहीं?

पर धाराओं को छोड़ दें। कोई मूरख भी यह समझ सकता है: आखिर हाइड क़ानून अमरीकियों पर लागू होता है या नहीं? हाँ होता है। अगर लागू होता है तो इस क़ानून के नतीजे लागू हो जाएँगे। मान लें कि हम नाभिकीय परीक्षण करते हैं। ऐसी स्थिति में अपने क़ानून के अधीन अमरीकियों को क्या करना होगा? हाइड क़ानून और १९५४ के आणविक ऊर्जा क़ानून के तहत अमरीकियों को भारत के साथ सारे नाभिकीय व्यवसाय बन्द करने होंगे। इन दोनों क़ानूनों और नाभिकीय विक्रेता समूह के तहत, अमरीकियों को यह निश्चित करना होगा कि नाभिकीय सुरक्षा समूह के सभी अन्य सदस्य भी भारत के साथ नाभिकीय सहयोग बन्द कर दें। सारांश यह, कि  उन पर लागू क़ानूनों के अधीन होने के नाते, अमरीकियों को हम पर पूरे पूरे प्रतिबन्ध लगाने होंगे। हमारे क़ानूनों के तहत प्रतिबन्ध नहीं लगते हैं,  पर उनके क़ानूनों के तहत लगते हैं, तो भी बात तो वही हुई न?

यही कड़वा सच १२३ समझौते में शामिल है। प्रश्न ३ में अमरीकी संसद बुश प्रशासन को पूछती है, “क्या प्रशासन यह मानता है कि भारत के साथ नाभिकीय सहयोग के समझौते और हाइड क़ानून के किसी भी प्रावधान के बीच में कोई विरोधाभास, मतभेद या असमानता होने पर यह समझौता ही सर्वोपरि है? जो प्रावधान हाइड क़ानून में नहीं हैं, पर नाभिकीय सहयोग समझौते में हैं, उन प्रावधानों के सन्दर्भ में भी यही बात लागू होगी क्या? ” जवाब में बुश प्रशासन कहता है कि १२३ समझौता “पूर्णतः हाइड क़ानून के तहत ही है,” और  “हाइड क़ानून व आणविक ऊर्जा क़ानून, दोनो द्वारा जो कुछ लाज़िमी है उसे पूरा करता ही है” – एक उदाहरण लें तो दोनो के तहत यह लाज़िमी है कि अगर भारत परीक्षण करता है तो यह समझौता तुरन्त रद्द कर दिया जाएगा, भले ही वह “शान्तिपूर्ण” ही क्यों न हो।

प्रधानमन्त्री ने बार बार यह कहा है कि सहयोग “पूर्ण” होगा, यानी नाभिकीय चक्र में होने वाली हर गतिविधि पर लागू होगा, साथ ही यह कहा है, कि भारत को “संवेदनशील तकनीकों” के बारे में पूरी जानकारी दी जाएगी। इससे अगर कुछ भी कम हुआ तो यह वह चीज़ नहीं रहेगी जो मैंने बुश जी के साथ दस्तखत किए दस्तावेज़ में लिखी थी। ऐसा बार बार कहा है, और यह भी कि इससे कम किसी चीज़ को स्वीकार नहीं किया जाएगा। मेरे जैसे लोगों ने शुरू से ही यह कहा है कि इस मामले में अमरीकी नीति बिल्कुल अटल रही है, और यह नीति बुश ने खुद और अमरीकी संसद ने भी बार बार दोहराई है – वह यह, कि भारत जैसे देशों को भारी जल के धनीकरण या परिष्कार या उत्पादन जैसी तकनीक की कोई जानकारी नहीं दी जाएगी। पर मनमोहन सिंह ने बार बार यही कहा है, “पूरा मतलब पूरा”।

और सबूत के तौर पर सरकारी प्रचारक १२३ समझौते  की धारा ५(२) का बखान करते हैं। यह धारा केवल लफ़्फ़ाज़ो लफ़्फ़ाज़ी है। यह कहती है, कि ये “संवेदनशील तकनीकें.. भारत को प्रदान की जा सकती हैं, उसके लिए इस समझौते में संशोधन करना होगा।” उसके बाद भी, यह धारा स्पष्ट कहती है कि यह स्थानान्तरण “दोनो दलों के क़ानूनों, नीतियों और अनुमितयों के तहत ही होगा”। यानी, तीन शर्तें : (क) “की जा सकती हैं”; (ख) “इस समझौते में संशोधन करना होगा”; और (ग) “दोनो दलों के क़ानूनों, नीतियों और अनुमितयों के तहत ही।” इसके बावजूद, सरकार के प्रचारक बार बार यह कह रहे हैं कि भारत को यह संवेदनशील तकनीकें प्राप्त हो गई हैं।

एक नहीं, छः सवालों (सवाल ४ से ९) के जवाब में बुश प्रशासन छः बार कहता है कि संवेदनशील तकनीकें भारत को नहीं दी जाएँगी, और इस समझौते को संशोधित करने का कोई प्रस्ताव भी नहीं है!!

इसी तरह सरकारी प्रवक्ता लगातार यह कहते आए हैं कि हमें खर्च किए ईंधन का पुनः परिष्कार करने का अधिकार दिया गया है। इतना ही नहीं, मनमोहन सिंह ने खुद कहा है कि हमें पुनः परिष्कार करने का अधिकार इस हद तक स्वीकारा गया है कि यह अधिकार “स्थायी” हैं। सवाल २६ व २९, और १२३ समझौते की धारा ११ व १२ भी खुद यह कहती हैं कि हम खर्च ईंधन का पुनः परिष्कार इन्हीं सूरतों में कर पाएँगे: (क) अपने खर्चे पर; (ख) आईएईए के अधीन रहते हुए; (ग) केवल अमरीका द्वारा स्वीकृत “बंदोबस्त और तौर तरीकों” के तहत। जहाँ तक इस अधिकार के “स्थायी” हो जाने की बात है, तो यह झूठ प्रश्न ४४ से सामने आ जाता है। यह जवाब यह तो दुबारा कहता ही है कि पुनः परिष्कार के “बंदोबस्त और तौर तरीकों” की स्वीकृति अमरीका से लेनी होगी, वह इतना भी कहता है कि  “भारत के साथ प्रस्तावित बन्दोबस्त और तौर तरीकों में पुनः परिष्कार की स्वीकृित रद्द करने का प्रावधान भी होगा।  हो गया स्थायी?

मनमोहन सिंह लगातार यह कहते आए हैं कि भारत कोई देख रेख या निगरानी स्वीकार नहीं करेगा। सिवाय अपनी आईएईए के साथ “भारत संबंधी संरक्षण” के तहत जो भी आता है, और कुछ नहीं। मेरे जैसे लोगों ने कॉण्डोलीज़ा राइस की कड़क और बिल्कुल स्पष्ट बातों की ओर ध्यान खींचा; अमरीकी संसद की संयुक्त समिति की रपट की ओर भी; हाइड कॉनून के प्रावधानों की ओर भी, जो स्पष्ट रूप से यह कहते हैं कि भारत को “इतर संरक्षण” स्वीकार करना होगा – यानी, अगर आईएईए या अमरीका ये सोचते हैं कि आईएईए अपने निरीक्षण ठीक से नहीं कर पा रहे हैं, तो अमरीका को निरीक्षण करने व  दूसरी संस्थाओं के जरिए निगरानी के और तरीके अपनाने का अधिकार होगा – अपनी संस्थाओं के जरिए या फिर अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के जरिए। मनमहोन सिंह की सरकार ने १२३ समझौते की धारा १० व १६(३) के तहत इन अतिरिक्त निरीक्षणों और बन्धनों को स्वीकार किया, पर ऐलान यह किया कि ऐसा कुछ होगा ही नहीं। बस, अमरीकी निरीक्षकों को “निरीक्षक”  कहने के बजाय “विशेषज्ञ” कहा गया। इन धाराओं के तहत भारत ने इन लोगों को उन सभी इलाकों और जानकारियों के निरीक्षण का अधिकार दे दिया है।

सवाल १० से १३ के जवाब में अमरीकी प्रशासन ने चार बार कहा है कि हाँ, अतिरिक्त प्रतिबन्ध और निरीक्षण भी होंगे। इतना ही नहीं प्रशासन अमरीकी संसद को यह भी कहता है कि अनन्त काल तक आईएईए के बचाव और निरीक्षण को स्वीकार करके भारत की सरकार  “यह अच्छी तरह समझती है कि समझौते की धारा १० के पहले अनुच्छेद का यह मतलब कतई नहीं है कि  कभी भी एजेंसी (यानी, आईएईए) के प्रतिबन्ध हट जाएँगे, वह तो रहेंगे ही।” अर्थात् – हमें एकदम उल्टी बात बताई जा रही है – “हम अमरीकी निरीक्षकों को अपने इलाके में खुली छूट नहीं देने वाले” – जबकि मनमोहन सिंह की सरकार ने इसी खुली छूट को स्वीकार कर लिया था।

मनमोहन सिंह और उनके प्रवक्ताओं ने कई बार कहा है कि अमरीका ने भारत को “व्यवधानरहित ईंधन” प्रदान करने का वादा किया है। इसके सबूत के तौर पर वे १२३ समझौते की धारा ५(६) की बात करते हैं। मैंने उसी समय यह कहा था कि यह धारा केवल बहकावा है। मनमोहन सिंह ने संसद को कहा था कि वे “व्यवधानरहित ईंधन” की सुविधा सुनिश्चित करेंगे, और यह १२३ समझौते में शामिल किया जाएगा। लेकिन, अमरीकी एक इंच भी नहीं हिले हैं। १२३ समझौते में ऐसा कुछ भी डालने से उन्होंने इनकार कर दिया। अन्त में मनमोहन सिंह सरकार की इज़्ज़त बचाने के लिए उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार के कथन की नकलचिप्पी इसमें शामिल कर दी कि १२३ समझौते में यह आश्वासन शामिल किया जाएगा। लेकिन यही तो १२३ समझौता है! १२३ समझौते में जो शामिल करना था, वह भविष्य के किसी १२३ समझौते के लिए छोड़ दिया गया है!

फिर भी, यहाँ पर लोगों को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश की गई – कि हमने अमरीकियों से “निरन्तर ईंधन प्रदान” करने का वादा ले लिया है। इतना ही नहीं, यह भी कहा गया कि किसी भी सूरत में ईंधन प्रदान करना बन्द किया ही नहीं जा सकता।  सवाल १५ और फिर सवाल १८ में अमरीकी सरकार यह कहती है कि अगर ईंधन प्रदान करने को बन्द करने के पीछे भारत की कोई गलती नहीं है, तभी अमरीका इसे फिर शुरू करने में मदद करेगा। अतः अगर कोई अमरीकी कंपनी ईंधन प्रदान करने में अक्षम हो जाती है, या वैश्विक बाज़ार में कुछ गड़बड़ी हो जाती है, तो अमरीका इसे शुरू करने में मदद करेगा। लेकिन, मान लें कि हम परीक्षण करते हैं; या हम अपनी यूरेनियम के आयात, खनन और इस्तेमाल का ब्यौरा देने में देर करते हैं: या १२३ समझौते, हाइड क़ानून, आईएईए के समझौते या ऍनऍसजी के निर्देशों का उल्लङ्घन करते हैं, और इनकी बदौलत ईंधन बन्द किया जाता है, तो अमरीका खासतौर पर ईंधन प्रदान करने के लिए आगे नहीं आने वाला।

इसी तरह हमें यह कहानी सुनाई गई है कि अमरीका ने  ईंधन के “सामरिक संचय” में मदद करने की सहमति दी है ताकि तारापुर का अनुभव दुबारा न हो। लेकिन इस दस्तावेज़ में दो बार – सवाल १९ और २० के जवाब में – हम यह पाते हैं कि ऐसा कोई आश्वासन है ही नहीं। हाइड क़ानून के ओबामा संशोधन के तहत, भारत ईंधन का संचय केवल  “मुनासिब प्रचालन की ज़रूरतों” के लिए कर सकता है। इतना ही नहीं, जवाब यह भी बताते हैं कि   – “मुनासिब प्रचालन की ज़रूरतों” – का वास्तव में मतलब क्या है, यह भी साफ़ नहीं है!

मनमोहन सिंह ने बार बार कहा है कि अगर ईंधन बन्द होता है या कोई और दिक्कतें पैदा की जाती हैं तो भारत को “उचित कदम” उठाने का अधिकार है। पर यह है क्या? हमने जानने की कोशिश तो की है पर जवाब कुछ नहीं आया है। अमरीकी संसद ने भी बुश के अधिकारियों से यही पूछा है। भारत के प्रधानमन्त्री के यह “उचित कदम” क्या हैं? बताया तो यह गया है, कि अगर सब कुछ ठीक नहीं चलता है तो हम अपने  रिऍक्टरों के निरीक्षण के लिए मनाही कर सकते हैं।

२५वें और ४२वें सवाल के जवाब से पता चलता है कि यह सिर्फ़ कोरी गप्प ही है। भारत की सरकार ने यह नहीं बताया है कि यह है क्या, ऐसा अमरीकी सरकार का कहना है। हम यह उम्मीद करते हैं कि भारत समझौते को पूरी तरह लागू करेगा, अतः निरीक्षण व रोकटोक “चिरकाल” के लिए होगी। इतना ही नहीं, अमरीकी सरकार उन्हीं शब्दों के इस्तेमाल के बारे में कहती है, जिनकी ओर मेरे जैसे लोगों ने संसद में ध्यान इंगित किया था, सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट कॉण्डोलीज़ा राइस ने अमरीकी संसद को कहा है कि  “हिन्दुस्तानियों को हमने साफ़ कहा है कि रोकटोक की चिरकालिकता का मतलब है बिना किसी शर्ते के रोकटोक की चिरकालिकता।

१२३ समझौता सार्वजनिक होने के बाद मैंने धारा १६ की ओर ध्यान खींचा था। यह कहता है कि अगर अमरीका के हिसाब से अगर भारत अपने वादे नहीं निभा रहा है, या यह समझौता रद्द हो जाता है, या इसका समय समाप्त हो जाता है, या भारत इसे मानने से मना कर देता है, तो भी अमरीका को इस समझौते के अधीन प्रदत्त सभी नाभिकीय, और गैर नाभिकीय सामग्री वापस पाने का अधिकार है, एक एक ग्राम ईंधन वापस माँगने का अधिकार है। यही बात सवाल ४१ और ४२ के जवाबों में फिर से कही गई है।

मनमोहन सिंह बार बार यह कह रहे हैं, और साथ ही पिट्ठू पत्रकार भी, कि भारत का परीक्षण का अधिकार जस का तस बरकरार है। अमरीकी संसद और अमरीकी सरकार ने कई बार बिल्कुल साफ़ साफ़ कहा है कि जैसे ही भारत कोई परीक्षण करता है, भले ही शान्ति के मकसद से ही, १२३ समझौता रद्द समझा जाएगा, और सभी नाभिकीय व्यापार समाप्त। यह सब तुरन्त होगा। यह बात इस दस्तावेज़ में चार बार कही गई है – सवाल १६, १७, ३७ और ३८ के जवाबों में। 

पर केवल परीक्षणों के बारे में ही सरकार ने झूठ नहीं बोला है। इन जवाबों से दो बातें और साफ़ हो रही हैं। पहली यह कि भारत द्वारा परीक्षण ही नहीं, और भी कई कारणों से यह समझौता और नाभिकीय व्यवसाय रद्द किया जा सकता है। वे कारण हैं “१२३ समझौते का उल्लंघन, या अन्तर्राष्ट्रीय आणविक ऊर्जा संस्था की रोकटोक का उल्लंघन”। और इन जवाबों की भूमिका में यह शब्द हैं: “उदाहरण के लिए“। दूसरा, सवाल ३८ का जवाब यह बताता है कि १२३ समझौते की धारा १४ भी यही कहती है और अमरीका के साथ साथ भारत भी इसको बखूबी समझता है।

आखिरी वार किया है आखिरी सवाल – ४५ – के जवाब ने, और यह बताता है कि मनमोहन सिंह सरकार कैसे सफ़ेद झूठ बोल रही है। सरकार यह कहती आई है कि अगर भारत के साथ नाभिकीय व्यापार बन्द होता है तो अमरीकी सरकार ने वादा किया है कि वह ऍनऍसजी के अन्य सदस्यों से रसद दिलाने में भारत की मदद करेगी। इस तरह का दावा यही सोच के किया गया होगा कि सुनने वाले बेवकूफ़ हैं। लेकिन यह दावा किया ही नहीं गया, सुनने वालों ने इसे गले भी उतार लिया, और पत्रकारिता के कई वर्गों में इसे अच्छी तरह फैलाया भी गया।

हाइड क़ानून के अधीन अमरीकी सरकार इसका बिलकुल उलट करने को बाध्य है – यानी, अगर वह १२३ समझौते को रद्द करता है, और भारत के साथ नाभिकीय व्यवसाय बन्द करता है, तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भारत ऍनऍसजी के किसी और सदस्य से भी यह रसद न ले पाए। सवाल ४५ के जवाब में यही बात दोहराई गई है, और अमरीकी सरकार की ज़िम्मेदारी के बारे में यही बात फिर से कही गई है। अमरीकी सरकार ने यह भी संसद से कहा है कि ऍनऍसजी में कुछ निर्देश पहले ही मौजूद हैं, और अगर अमरीका भारत से साथ नाभिकीय व्यवसाय बन्द करता है, तो यह निर्देश निश्चित रूप से लागू होंगे।

अमरीकी सरकार के अनुसार, ऍनऍसजी के निर्देशों का अनुच्छेद १६ यह कहता है कि  “(१) अगर एक या अधिक विक्रेता यह समझते हैं कि समझौते का उल्लङ्घन हुआ है तो विक्रेताओं को आपस में सलाह करनी चाहिए (२) ऐसा कोई कदम न उठाएँ जिससे उल्लङ्घन के नतीजन उठाए कदम के साथ विरोधाभास हो; और (३) ‘उचित प्रतिक्रिया और संभव कार्यवाही’ पर सहमति हो, जिसमें उस प्राप्तकर्ता को नाभिकीय सामग्री देने पर पाबन्दी भी शामिल हो सकती है। ” अगर ऍनऍसजी भारत के लिए इस अपवाद को मान लेती है, तो भी अमरीकी सरकार का आश्वासन है कि यह नीति ही  “नाभिकीय विक्रेता समूह के किसी और सदस्य द्वारा भारत को सामग्री प्रदान करने पर भी लागू होगी।”

फिर भी झूठ बोले जा रहे हैं।

नाभिकीय समझौता अब दो पाप के घड़ों में बन्द है। मतों की खरीदफ़रोख्त का पाप। और यह झूठ का घड़ा।

मैं बस बहुत अपने हृदय में दुःख समेटे, पत्रकारों को यही कह सकता हूँ: इस तरह के झूठ को फैलाने में सहयोग न दें

– अरण शूरी, ६ सित. २००८

Original Article in English

जिहादियों को दान – भाग ३

कुछ समय पहले मैंने भारत द्वारा पाकिस्तानी जिहादी गुटों को दान पर क्षोभ व्यक्ति किया था और फिर उसी लेख की टिप्पणियों का एक प्रत्युत्तर दिया था। पहले लेख की टिप्पणी के तौर पर तनवीर ने लिखा था:

अतनु: आप ठहरे अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट, आपको तो दुनियादारी के बारे में अच्छी तरह मालूम ही होगा। हर चीज़ के लिए तार्किक कारण नहीं होता है, खासतौर पर राजनीति की दुनिया में। आपके तर्क के आधार पर, जब भारत खुद नाभिकीय हथियारों पर इतना खर्च करता है, तो उसे भी किसी प्रकार के अनुदान की उम्मीद करना गलत है। और चूँकि अमरीकी फौज का खर्चा बाकी पूरी दुनिया से कहीं अधिक है, इसलिए अमरीका को अमन और शान्ति की बात करने का कोई हक़ नहीं है। लेकिन फिर भी अमरीका संयुक्त राष्ट्र को पैसा देता है, और जब मन होता है तो उसकी अवमानना कर के अपनी मर्जी से भी काम करता है। जिस भी देश की फौज है, उसे विनाशक त्सुनामी के समय कोई आर्थिक सहायता नहीं मिलनी चाहिए थी। लेकिन दुनिया ऐसे नहीं चलती है साहब। जहाँ तक मुस्लिम आक्रमणकारियों से सम्बन्धित आपकी टिप्पणियों का सवाल है, तो आपको याद रखना चाहिए,  “खून के बदले खून का मतलब पूरी दुनिया में सब खूनी, और ज़िन्दा कोई भी नहीं” साथ ही, अगर हमें अपने इतिहास को ले के इतनी ही चिन्ता है तो हमें बरतानिया का हाई कमीशन बन्द कर देना चाहिए। कम से कम जब तक अंग्रेज़ यहाँ आए, भारत सबसे अमीर देश था। सिर्फ़ मिसाइल का नाम बदल देने से उसका चरित्र नहीं बदल जाता है। चाहें पृथ्वी हो या ग़ौरी, मरेंगे तो उतने ही लोग।

दुनियादारी समझने के लिए अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट लेना ज़रूरी नहीं है।  साधारण अक्ल वाला कोई भी यौवन को प्राप्त व्यक्ति थोड़ा बहुत विचार कर के खुद दुनियादारी के बारे में समझ सकता है। मेरी पूरी दलील का मूलभूत सिद्धान्त लेख के पहले वाक्य में निहित है: पैसे का कोई चरित्र नहीं होता।

किसी भी इकाई के पास सीमित संसाधन होते हैं, चाहे वह इकाई एक अकेला इंसान हो या भरापूरा राष्ट्र। यह उस इकाई की मर्ज़ी है कि वह उन संसाधनों का इस्तेमाल कैसे करें। अगर वह इकाई विनाशक गतिविधियों में संसाधनों को खर्च कर देती है, तो ऐसे फ़ैसले लेने वाली इकाई को और अधिक संसाधन दान में देना और उनको प्रोत्साहन देना किसी भी दृष्टि से नैतिक तो है ही नहीं। इतना ही नहीं यह पूरी तरह अदूरदृष्टिपूर्ण और अनैतिक है। अगर कोई भी देश, किसी दूसरे देश में हाहाकार मचाने के लिए अपने आप को लामबन्द करने में ही अपने संसाधन नष्ट करने पर तुला हो, तो उस देश को किसी से सहानुभूति या भौतिक सहायता की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, देश चाहें जितना बदहाल हो। यह मापदंड मैं सभी राष्ट्रों पर लागू करूँगा ही। आतङ्की राष्ट्रों के मामले में इस बात पर और ज़ोर दूँगा।

इस मानक के आधार पर मैं यहीं कहूँगा कि न तो भारत को किसी और राष्ट्र द्वारा मदद दी जानी चाहिए, न ही ऐसी मदद दिए जाने पर भारत को स्वीकारना चाहिए। जब तक महाविनाश के अस्त्रों और शस्त्रों को एकत्रित करने में भारत अपना अल्प धन खर्च कर रहा है, यही सर्वोचित है। मुझे इस बात का अहसास है कि भारत के पड़ोसी खतरनाक हैं, और नाभिकीय असले से लैस पड़ोसियों को धमका के रखने के लिए भारत को भी नाभिकीय अस्त्र चाहिएँ और उनके प्रक्षेपण के लिए मिसाइलें भीI लेकिन नीति के आधार पर भारत को किसी और राष्ट्र से दान नहीं लेना चाहिए।

ज़रूरी बात। जो देश अपने सीमित धन का इस्तेमाल भारत को नष्ट करने के लिए हथियार खरीदने में ही खर्च कर डालते हैं, उन्हें तो दान कतई नहीं देना चाहिए। इसके दो कारण हैं, पहला, कि पैसे का कोई चरित्र नहीं होता: भारत, गरीबों को रोटी खिलाने के लिए पैसे दे या आम निरीह भारतीयों को मारने के लिए जिहादियों की बड़ी फौज खड़ी करने के लिए पैसे दे – पैसा तो पैसा ही है, एक पैसे को आप दूसरे पैसे से अलग नहीं पहचान सकते हैं। ऐसे पैसा देना ग़ैरज़िम्मेदारी है और अनैतिक है। इस प्रकार की बावलेपन वाली हरकत आखिर होती क्यों है यह समझना भी आसान ही है। जिनके पास दानवीर कर्ण बनने की ज़िम्मेदारी है वे स्वयं तो इसके दुष्प्रभाव से सर्वथा सुरक्षित ही हैं। अगली बार जब जिहादी आतङ्कवादी – भारतीय नेताओं द्वारा दिए पैसे से – आतङ्क फैला के भारत में बीसियों लोग मारेंगे, तो इन दानवीरों को अपना खून पसीना थोड़ी बहाना होगा। बहुत दुख की और अशोभनीय बात है कि नेताओं के पास कड़ी सुरक्षा है (और सड़क पर चलने वाले आम आदमी के पास नहीं है) इसलिए अपने किए का फल उन्हें कभी भुगतना ही नहीं पड़ता।

राष्ट्रों द्वारा दान के विरोध का मेरा दूसरा कारण है – दान वैकल्पिक, स्वेच्छा से दिया जाना चाहिए। अगर मैं आपकी जेब काटूँ और फिर वह पैसा दान कर दूँ, तो भी इसमें कोई बड़ाई तो नहीं है न? और भी बुरा, अगर मैं चक्कू की नोंक पर पैसे हड़पूँ और फिर पैसा भी दूँ उसे जिसे आप कभी देना नहीं चाहते थे। भारत सरकार, करदाता का पैसा ले के उसका कुछ हिस्सा पाकिस्तान को देते समय ठीक यही करती है। भारत के लोगों को इस बात की आज़ादी दी जानी चाहिए कि वे किसे दान देना चाहते हैं। भारत का नागरिक होने के नाते प्रधानमन्त्री जी अपना खुद का पैसा पाकिस्तान भेजने को स्वतन्त्र हैं, और बाकी नागरिक भी इसी तरह स्वतन्त्र हैं। लेकिन मेरा पैसा ले के पाकिस्तान में बाँट देना – यह बिल्कुल अनैतिक है। उन्होंने मेरी इज़ाज़त नहीं ली है, और इज़ाज़त लिए बगैर भी यह समझना मुश्किल नहीं है कि मैं कभी पाकिस्तानी जिहादियों को अपनी कमाई भेजने की हिमायात नहीं करूँगा। हमारे प्रधानमन्त्री जी मन ही मन इतना भर विचार कर लें – भारत के ४० करोड़ लोग दिन में एक डॉलर नहीं कमा पाते हैं। उनसे अगर वे इन ४० करोड़ लोगों से पूछें कि भइया, अपने यहाँ आतंक फैलाने के लिए ढाई करोड़ डॉलर पड़ोस में दे दें क्या – तो क्या जवाब मिलेगा उन्हें?

प्ररधानमन्त्री को पूर्ण आदर के साथ मैं यही कहना चाहूँगा कि यह बेवकूफ़ी है। इसके लिए मैं उन्हें ज़िम्मेदार मानता हूँ। यह बात मैं उनके मुँह पर भी कह सकता हूँ।

साथ ही यह भी कहना चाहूँगा कि यह कुछ नया नहीं है। भारतीय प्रधानमन्त्री चिरकाल से पाकिस्तान के मामले में बेवकूफ़ी वाली नीतियाँ लागू करते आएँ हैं। शुरुआत हुई नेहरू से। पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण किया और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के आगे मामला टिका दिया। उनकी बेटी इन्दिरा ने यह कचरा साफ़ करने की कोई कोशिश नहीं की। पाकिस्तानी फौज की शर्मनाक हार के बाद, सारे पत्ते हमारे हाथ में थे, हमारे पास ९०,००० पाकिस्तानी युद्धबन्दी थे, लेकिन फिर भी अपनी बात मनवाना उन्हें नहीं आया। फिर वाजपेयी ने पृथ्वीराज चौहान की परम्परा को निभाया। चल पड़े “बस यात्रा” पर और मुशर्रफ़ की ओर से बस की सीट के पीछे से छुरा घुँपवा के आए। नहीं यह मैंने गलत कहा। छुरा उन्हें नहीं लगा – एक हज़ार गरीब सिपाहियों को लगा जो करगिल की बर्फ़ में दब के मर गए। वाजपेयी जी अपने पहले वालों की तरह अपने घर में आराम फ़रमा रहे थे, पूर्णतः सुरक्षित। न तो नेहरू पर कोई असर पड़ा और न ही उनके भाई बन्धुओं पर। भारतीय सेना में जो फौजी भरती होते हैं वही इन गलतियों की कीमत चुकाते हैं – अपनी जान दे के। गरीब फौजी कटते हैं, और उसके बाद नेहरू जैसे लोग, लता मङ्गेशकर के  “ऐ मेरे वतन के लोगो“ सुन कर घड़ियाली आँसू बहाते हैं।

अर्थशास्त्री हमेशा यह कहते हैं कि जब तक नीति निर्धरकों को प्रलोभन सही दिए जाएँगे, दुनिया किसी भी समस्या का सही समाधान खोजने को तत्पर रहेगी। मैं पूरी तरह से इस बात को मानता हूँ। आधुनिक युद्ध की समस्या, प्रलोभन की ही है। अगर खुद के बच्चे ईराक़ में भेजने पड़ते तो मूर्ख बुश आक्रमण करने को कितना तत्पर होता? अगर अमरीकी सिनेटर बनने के लिए बच्चों को फौज में भर्ती करना ज़रूरी होता तो अमरीकी सिनेट दुनिया में कितने युद्धों की मञ्जूरी देती? अगर सरकार चलाने वालों के सभी बच्चों का फौज में होना लाज़िमी होता तो कोई भी सरकार कितने युद्ध शुरू करने की सोचती? नेताओं की वजह से ही, और कभी कभी सेनापतियों की वजह से – जिन्हें कुछ खोने का डर नहीं है – इतने युद्ध होते हैं।

वापस तनवीर की टिप्पणी पर आते हैं। हाँ, अगर कोई देश अपने खिलाफ़ भविष्य में होने वाले युद्धों की तैयारी में लगा हो तो वह अपने नागरिकों की त्सुनामी या भूकम्प के समय में मदद करने के काबिल नहीं होता। अगर पाकिस्तान अमरीका को पाँच खरब डॉलर दे कर ऍफ़१६ विमान खरीदता है, और उसके बाद कटोरा ले के कुछ लाख डॉलर की भीख माँगता है ताकि उसके नागरिकों की मदद की जा सके, तो दया और धन के बजाय ढोंगी, पाखण्डी पाकिस्तान को तिरस्कार मिलना चाहिए। 

जब भी गैर सरकारी संस्थान पूरी दुनिया में जा के गरीबों की मदद करने के लिए भीख माँगते हैं तो मुझे यह यह समझ नहीं आता कि वे दुनिया भर की सेनाओं द्वारा संसाधन नष्ट करने पर वे कुछ क्यों नहीं करते। मैं खुद इनका स्वयंसेवक रहा हूँ, और हाँ, मानता हूँ, यह मेरी मूर्खता थी। एक संस्था के स्वंयसेवी पैसा इकट्ठा करने में काफ़ी समय लगाते थे। कुछ लाख डॉलर के लिए। और फिर इसके लिए वह अपने आपको साधुवाद देते थे। यही समय सैन्य खर्चा कम करने की सोच में लगाया जाता, युद्ध के आगे की सोचने में लगाया जाता, तो करोड़ों डॉलर बचते – सिर्फ़ शिक्षा आदि के लिए कुछ लाख नहीं। लेकिन नहीं। अनुपयुक्त प्रणाली को बदलने के के बारे में सोचने के बजाय बस चन्द पैसे इकट्ठे करना, संस्थाओं को मूर्खता है।

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मैंने लेखन बन्द किया है। कारण? मैं निराश हो चुका हूँ, पूरी तरह। कुछ दिनों से यह सोच रहा हूँ कि यह प्रणाली इतनी खराब है कि इसे बदलने की कोशिश भी करना बेकार है। अनन्त चक्र है। राजा बुरा है क्योंकि प्रजा अज्ञानी और मूर्ख है। राजा बुरा है तो प्रजा सुधरेगी भी नहीं। मुझे विश्वास है कि कुछ पाठक बहुमत को अज्ञानी और मूर्ख कहे जाने पर आपत्ति करेंगे। लेकिन आप सिद्ध करें कि बहुमत अज्ञानी और मूर्ख नहीं है। इतनी बुरी हालत के लिए ज़िम्मेदार कौन है? भारत में २५ करोड़ लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं, और यह रेखा खुद इतनी नीचे है कि आपको ऊपर रहने के लिए बस दिन की २००० कैलोरी खरीदनी होंगी। सोचिए: अगर २००० कैलोरी खरीदने लायक आपके पास दिन के सात रुपए हैं तो आप गरीबी रेखा के ऊपर हैं। इस परिभाषा के अनुसार तब आप गरीब नहीं हैं। लेकिन फिर भी पच्चीस करोड़ लोग – पूरे पश्चिमी यूरोप की जनसङ्ख्या के बराबर के लोग – ऐसे हैं जिनके पास उतना भी नहीं है। इस खड्ड में हम पहुँचे कैसे? जब भारत आज़ाद हुआ था तो बस ३५ करोड़ लोग थे, आधे गरीब। इतने सालों के विकास, उन्नति, प्रगति, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों, नेहरूवादी समाजवादी कार्यक्रमों के बाद हमने बिल्कुल गरीब लोगों की सङ्ख्या में साढ़े सात करोड़ और जोड़ दिए हैं, घटाना तो दूर की बात। अगर वास्तव में यह राष्ट्र सामूहिक रूप से इससे बेहतर काम करने लायक था, तो ऐसा क्यों हुआ? क्या नेता मूर्ख थे? या जो लोग हर बार इन चोरों को सत्ता दे देते थे, वह मूर्ख थे?

जिन नीतियों ने हमें गड्ढे में डाल दिया है, वैसी ही और भी लगातार आ रही हैं। और क्यों न आएँ? प्रलोभन का ढाँचा तो नहीं बदला है। नेताओं और नौकरशाहों को अभी भी उन्हीं विफल नीतियों को लागू करने का प्रलोभन है। अर्थव्यवस्था की हालत बुरी होती है पर उनकी नहीं। जब तक प्रलोभन का यह ढाँचा नहीं बदलेगा, भारत के लिए कुछ आशा करना बेकार है। 

खेद है कि मैं खुशी के गीत गाते हुए, भारतीय उपभोक्ता का गुणगान करते हुए, विकास से भारत के परिवर्तन की कहानी नहीं सुना रहा। यह गान करने वाले लोग अधिकतर बेहोशी की हालत में होते हैं। शायद मैं भी किसी दिन यह भाँग का गोला खा के मस्त हो जाऊँ।  लेकिन तब तक नीति निर्धारकों के प्रलोभनों को सही दिशा में ले जाने के बारे में कुछ और लिखूँगा। 

Original article in English

भारत पाकिस्तानी जिहाद के लिए पैसे दे रहा है – प्रत्युत्तर

भारत पाकिस्तान के जिहादी गुटों को पैसा दे रहा है” पर डैन ने कहा:

आप यह भी तो कह सकते थे कि पाकिस्तान की ज़रूरत के समय भारत की दया और दान की वजह से कम से कम कुछ पाकिस्तानियों पर अच्छा असर पड़ेगा। शायद इस मदद से दो लोगों के दिल और मन बदलेंऔर हो सकता है कि इससे आपके पड़ोसियों के अन्दर बगल के घरों पर बम गिराने कि इच्छा कम हो।

डैन जीमज़ाक कर रहे हों तो बात और हैवरना आपकी मासूमियत पर मुस्कुराहट ही आती है। अगर २,५०,००,००० डॉलर से दो दिल बदल जाएँगे तो कुछ मिलियन दिल बदलने के लिए ब्राज़िलियन** डॉलरों की ज़रूरत होगी(और इतने पैसे की उधारी – आन्तरिक व विदेशी मिला के – तो अमरीका की भी नहीं है – कुछ हज़ार खरब डॉलर ही है।)
डैन साहबपाकिस्तानी सैन्य नीति, पाकिस्तानी सेना निर्धारित करती है। वह तो छड़िएवहाँ सब कुछ सेना ही निर्धारित करती है। कुछ साल छोड़ दें तो पाकिस्तान हमेशा से ही सैनिक तानाशाही में रहा है। इसलिएआम आदमी कुछ भी सोचे-मानेइसका रत्ती भर असर पाकिस्तान की नीतियों पर नहीं पड़ने वाला। पड़ता भी होतो भी यह आम आदमी “शैतान काफ़िर बुतपरस्ती” हिन्दुओं के देश को इस दुनिया से मिटा देने के लिए घास तक छीलने और खाने को तैयार होगा। पाकिस्तान के नेता सार्वजनिक रूप से कई बार भारत के खिलाफ़ १०००-साला जिहाद का वादा कर चुके हैं। यह भी मान के चल लें कि ये सारे जिहाद एक साथ ही शुरू हुएतो भी काफ़िर भारत के खिलाफ़ ९५० साल की जिहाद बाकी हैअगर ये जिहाद एक के बाद एक होंगे तो कुफ़्र भारत को ३००० साल और लड़ना होगा।

आप कह सकते हैं कि बुतपरस्त शैतान हिन्दू होने के नाते मैं बहुत अधिक बढ़ा चढ़ा के बातें कर रहा हूँ। शायद यह सही है। पर हम तो यहाँ बस अतिशयोक्ति अलङ्कार पर बहस-बात कर रहे हैंऔर उधर पाकिस्तान तो $५,००,००,००,००० (यानी पाँच खरब डॉलर) के ऍफ़-१६ खरीद रहा हैबातें नहीं कर रहा है। इसके अलावा और भी बहुत सा असला ले रहा हैपाँच पे दस की शर्त लगी कि इस असले का इस्तेमाल अफ़ग़ानिस्तानचीनसऊदी अरबईरानया पूर्व सोवियत यूनियन के गणराज्यों के खिलाफ़ नहीं होने वाला है। इनका निशाना भारत है अजीज़ डैन साहब।

मेरे पुरखे बहुदेवपूजी होने के नातेबर्बर इस्लामी आक्रमणकारियों की क्रूरता का ग्रास बनेइनके नेता थे बाबरग़ौर मुहम्मदमहमूद ग़ज़नीअहमद शाह अब्दाली। ये शख्स तो निकल लिए पर अपनी विरासत छोड़ गए हैं। पाकिस्तान की खूनी मिसाइलें जो नाभिकीय अस्त्र गिराने के काबिल हैंइन्ही महाशयों के नाम पर रखी गई हैं जो भारत को नष्ट करने कभी आए थे। इन मिसाइलों का मुँह सउदी अरब या चीन या अफ़ग़ानिस्तान की ओर नहीं है। इनका मुँह मुम्बईनई दिल्लीबङ्गलोर और नागपुर(मेरा घर) की ओर है ताकि ये वह सब निपटा सकें जो इनके हमनाम सैकड़ों सालों पहले पूरा नहीं कर पाए थे।

वापस उसी बात पर आते हैं, यानी भारत द्वारा पाकिस्तानी जिहादियों को पैसे दिए जाने वाली बात पर। मैंने पिछले लेख में सबसे पहले जो कहा था उसी को फिर से यहाँ दोहराता हूँ: पैसे का कोई चरित्र नहीं होता है।

आप पाकिस्तान को किस चीज़ के लिए पैसे भेज रहे हैं, इससे क्या फ़र्क पड़ता है? जब तक पाकिस्तान ढाई करोड़ डॉलर से अधिक पैसा आतङ्कवाद को पनपने में लगा रहा है, तब तक यह माना जा सकता है कि भारत द्वारा दिया गया दान पूरी तरह से आतङ्कवाद के प्रोत्साहन में ही काम आएगा। यह लीजिए गणित। अगर पाकिस्तान, भारत को नष्ट करने के लिए अपने ऊपर और आतङ्कियों के ऊपर केवल १ करोड़ डॉलर खर्च कर रहा होता, तो इसका यह मतलब होता कि ढाई करोड़ डॉलर उन्हें भेज कर हम १ करोड़ रुपए अपने आपको नष्ट करने के लिए ही दान में दे रहे हैं, और बाकी डेढ़ करोड़, शायद, भूखों को रोटी खिलाने के लिए बचेगा। पर अगर पाकिस्तान भारत को नष्ट करने के लिए $५ खरब के हथियार खरीद रहा है, तो भारत द्वारा अमरीका को २.५ करोड़ भेजने का मतलब है भारत को नष्ट करने के खर्चे की आधा फ़ीसदी रकम का योगदान, भूखों को रोटी देने के लिए कुछ भी नहीं। दूसरे शब्दों में, आँख के अन्धे, गाँठ के पूरे।

अगर पैसे का अपना कोई चरित्र न होने का मेरा तर्क अभी भी पूरी तरह स्पष्ट न हुआ हो, तो मैं एक और उदाहरण से समझाता हूँ। अगर पाकिस्तान अमेरिका से बस एक ऍफ़-१६ कम खरीदता है, तो उसके पास भूकम्प पीड़ितों की मदद के लिए दस करोड़ डॉलर बिना कुछ किए धरे आ जाते हैं।  अगर उनके पास हथियार खरीदने के पैसे हैं तो उन्हें अपने जानी दुश्मन से दान लेने की कुछ खास ज़रूरत है ही नहीं।

भारत सरकार को मेरी ओर से कुछ बिन माँगी फ़ोकट की सलाह: पहले दिया घर में जलाओ। अगर आप नई दिल्ली और भारत के बाकी हिस्सों की झुग्गियों में झाँकेंगे तो आपको लाखों कश्मीरी मिलेंगे जिन्हें अपने पुरखों के इलाकों से खदेड़ा गया है, पूरी नस्ल को साफ़ किया गया है। पहले उन्हें दो ढाई करोड़ डॉलर, बेवकूफ़ों।

** [ब्राज़िलियन एक बहुत बड़ी अज्ञात सङ्ख्या को कहते हैं। यह शब्द बना ऐसे। राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश को बताया गया कि एक मुठभेड़ में तीन ब्राज़ीलियन सैनिक मारे गए। उन्होंने शालीनता अपना सर नीचे झुका लिया। उनके सलाहकार इस भावुकता से चकराए, आखिर सैनिक ब्राज़ील के थे, हमारे नहीं।  फिर उन्होंने अपना सर उठाया और पूछा, “एक ब्राज़िलियन बराबर कितने मिलियन?”]

[इस धारावाहिक की आखिरी किश्त: भारत पाकिस्तानी जिहादियों को पैसा दे रहा है का भाग ३।]
Original article in English

भारत पाकिस्तान के जिहादी गुटों को पैसा दे रहा है

पैसे का कोई चरित्र नहीं होता है

अगर मैंने अपने पड़ोसी को राशन खऱीदने के लिए पैसा दियातो मैंने सच्चरित्र होने का सुबूत देते हुए पड़ोसी धर्म निभायालेकिन अगर पड़ोसी शराबीनशेड़ी हो तोहो सकता है कि उसे पैसे दे के मैं उसे फ़ोकट की दारू दे रहा हूँ। मान लो कि मैं पैसे देने के बजाय खुद ही राशन खरीद लाता हूँ और सीधे उसके घर दे आता हूँतो भी उसके तो शराब के पैसे ही बचे। इससे भी बुरा। अगर मेरा पड़ोसी वास्तव में अपने घर के तहखाने में बम बनाता होऔर समय समय पर मजे लेने के लिए मेरे घर में गिरा के उसे तहस नहस करता रहता हो तोनिश्चय ही दयाभाव से ओतप्रोत हो के उसे राशन के पैसे देनेऔर मेरे ही खिलाफ़ प्रयुक्त बमों के लिए पैसे देने, दोनो सूरतों में कोई खास फ़र्क नहीं है।

यह बात तो आसानी से समझ आ जाती है नलेकिन हमारे महात्मारूपी सुचरित्र नेताओं को क्यों समझ नहीं आती हैपाकिस्तान को २,५०,००,००० अमरीकी डॉलर का दान देने का मतलब है जिहादियों को भारत में आतङ्क फैलाने के लिए कुछ पैसा देना। बात को थोड़ा और समझते हैं। भारत एक दयालु, सुचरित्र देश है। कत्रीना तूफ़ान के बाद अमरीका को भारत ने पचास लाख डॉलर भेजे थे। अब अमरीका से ८० ऍफ़-१६ खरीदने वाले देश को भारत ढाई लाख डॉलर देने जा रहा है। इन ऍफ़-१६  जहाज़ों की कीमत में लाखों गरीब पाकिस्तानियों को खिलाया पिलायासजाया धजायापढ़ाया लिखाया और आमोदित प्रमोदित किया जा सकता था। इसके बजायपाकिस्तान अपने लोगों को भूखों मरने से बचाने में इस सीमित धन का इस्तेमाल नहीं कर रहा हैबल्कि ऐसी चीज़ में खर्च कर रहा है जिससे कि ज़रूरत पड़ने पर भारत पर बम गिराए जा सकें। और तो औरपाकिस्तानियों के इस प्रण को पूरा करने में पूरी पूरी मदद करने के लिएभारत उन्हें एक ढाई करोड़ डॉलर का चेक भी भेज रहा है!

सैकड़ों सालों से धिम्मी(मुस्लिम शासकों के अधीन ग़ैर मुस्लिम प्रजा) बने रहने से ऐसा ही होता है। भारतीय मानस में धिम्मीपना कूट कूट के भरा हुआ है। आज की तारीख में जज़िया(करजो गैर-मुस्लिम प्रजा मुस्लिम शासक को देती थी) देने की कोई मजबूरी नहीं है। लेकिन पुरानी आदतें जाती कहाँ हैं। चाहें जितना छिपा लेंयह ढाई करोड़ डॉलर जज़िया ही है जो धिम्मी दे रहे हैं।

भारत में करोड़ों भूखे नङ्गे बच्चे इधर उधर कूद रहे हैं। ढाई करोड़ डॉलर की मदद से ये बच्चे कुछ इंसान की तरह जी पाते। पर अब हम पाकिस्तानी जिहादियों पर पैसे लुटा रहे हैंजो कुछ और भारतीय शहरों में बम विस्फोट करेंगे। वास्तव मेंअनन्त और अनादि काल से मूर्खता प्रदर्शित करने वालों को वही मिलता है जो उनकी अक्ल के लायक होता है।

पुनश्च ३ नवम्बर २००५: टिप्पणियों की प्रतिक्रिया स्वरूप एक और लेख यहाँ देखें।


Original article in English, 2005-10-31

मुकेशभाई बढ़िया हैं

मुकेश अम्बानी मुझे बेहद पसन्द हैं। वह बढ़िया हैं। आशा करता हूँ कि वे खूब पैसे कमाएँ। यह रहा न्यू यॉर्क टाइम्स में छपा उन पर एक लेख: मुकेश अम्बानी – भारत के सबसे अमीर इंसान – से मिलिए।

. . . (आभार: Tarang_72)

Original article in English

प्रिय श्री रतन टाटा जी…

प्रिय श्री टाटा जी,

आशा है कि आप तटीय उड़ीसा में प्रस्तावित व्यावसायिक बन्दरगाह स्थापित करने का निर्णय ऑलिव रिड्ली समुद्री कछुए को मद्देनज़र रखते हुए, और उसका गम्भीर अध्ययन करने के बाद ही करेंगे। धन्यवाद।

सविनय,
अतनु

[सन्दर्भ।]

Original article in English