पानी से चलने वाली कार

(आर ऍस मलपति से) रॉय्टर्स का ब्यौरा,  जापान में जेनेपैक्स द्वारा पाने से चलने वाली कार

इस कार में एक ऊर्जा जनक है जो कि कार की टंकी में डाले पाने के अन्दर से हाइड्रोजन खींच लेता है। फिर यह जनरेटर इलेक्ट्रॉन छोड़ता है, जिनकी मदद से कार चल पड़ती है। इस तकनीक का आविष्कार करने वाली कम्पनी, जेनेपैक्स जापान  के कारनिर्माताओं के साथ मिल कर इस प्रकार की कार बनाने जा रही है।

शुक्र है भगवान का कि अविश्वसनीय तकनीक पैदा करने वाला भारत अकेला नहीं है (याद करें, कुछ साल पहले एक बाल्टी पानी में कुछ डंडियाँ डाल के डीज़ल पैदा करने वाला सनसनी खेज “आविष्कार”), गूगल में “water fuel” की खोज कीजिए, आपको सिरफिरों और उचक्कों द्वारा प्रकाशित बहुत सारी अविश्वसनीय तकनीकें मिलेंगी। उदाहरण के लिए देखिए यह वाली

सोचने के मजबूर हो जाता हूँ कि लोगों को कब समझ आएगा,  स्वचालित यन्त्र बनाना सम्भव नहीं है। पानी में मौजूद हाइड्रोजन के अणु को तोड़ने के लिए ऊर्जा तो चाहिए। और यह ऊर्जा कहीं से तो आएगी। रॉय्टर्स का ब्यौरा बस इतना कहता है कि इस कार में एक “ऊर्जा जनक” है जो कि हाइड्रोजन खींचने के लिए ऊर्जा का इस्तेमाल करता है। वाह! तो फिर इस “ऊर्जा जनक” की ऊर्जा का ही इस्तेमाल क्यों न कर लें – बीच में पानी फेरने की भी क्या ज़रूरत है?

ठीक है, हो सकता है कि पानी यहाँ पर “काम का द्रव्य” हो, जैसे आम आन्तरिक दहन इंजन में काम का द्रव्य होती है वायु। थोड़ा ईंधन लो, उसे जलाओ(वायु में), उससे सिलिण्डर में मौजूद वायु को गर्म करने की ऊर्जा पैदा होती है,  इससे वायु फैलती है, और इस फैलाव से आप कुछ काम कर लेते हैं, फिर इस फैली हुई वायु को बाहर फेंक देते हैं (एग्ज़ास्ट इस काम के द्रव्य के बाहर निकलने को ही कहते हैं), और फिर से वही कहानी बार बार दोहराते जाते हैं। पर फिर भी ऊर्जा का स्रोत तो चाहिए ही न – आमतौर पर यह तेल जैसा कोई हाइ़ड्रोकार्बन होता है।

यदि ऐसा है तो अगर पानी यहाँ ईंधन है, तो आंतरिक दहन इंजन में वायु ईंधन है। अगर कोई रहस्यमय तकनीक है जो एकदम शून्य में से ऊर्जा पैदा कर देती है तो बताओ भई इसके बारे में। या, न ही बताओ तो अच्छा है। हमने कोल्ड फ़्यूज़न के बारे में भी सुना था, लेकिन यह भी वह चीज़ नहीं थी जो इसके आविष्कारकों ने कहा था।

सोचने को मजबूर हो जाता हूँ कि रॉय्टर्स कब ऐसे लोगों को अपने यहाँ रखना शुरू करेगा जिन्हें विज्ञान के मूलभूत सिद्धान्तों का ज़्यादा नहीं तो थोड़ा बहुत ही ज्ञान हो।

Original article in English

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हिटलर के जोड़ीदार बहुत हैं

कनाडा के प्रकाशन ‘द प्रॉविंस’ (मङ्गलवार, १ मई १९९०) से, लेखक: क्रॉफ़र्ड किलियन।

ऍडॉल्फ़ हिटलर के बहुत से जोड़ीदार हैं

मेरे वकील साहब, निक मेफ़िस्टो, कल मुझे जश्न मनाने दावत पर ले गए, चिन्ता हुई।

निक साहब अजीबोगरीब चीज़ों की वकालत करते हैं। वह जिन चीज़ों की वकालत करते हैं, जिन चीज़ों का वह जश्न मनाते हैं, आम लोगों को उनसे घिन ही होती है।

‘ऍडॉल्फ़ हिटलर की ४५वीं सालगिरह है,’ निक साहब ने फ़रमाया ‘मेरे मुवक्किल ३० अप्रैल १९४५ से उनकी आवभगत कर रहे हैं- और साथ ही उनकी छीछालेदर भी कर रहे हैं।’

‘मेरा अन्देशा है कि आपके मुवक्किल को ऐसे दैत्य पर बहुत नाज़ है।,’ मैंने कहा।

‘अमा, हिटलर कोई दैत्य वैत्य नहीं था।’

‘क्या! द्वितीय विश्व युद्ध का कारक, थोक में हत्या करने वाला जल्लाद, दैत्य नहीं था?’

‘याद कीजिए, मेरे मुवक्किल ने बाल धूप में सफ़ेद नहीं किए है। हिटलर तो एक आम सा नेता था।’

‘क्या बेहूदी बात कर रहे हैं आप! वह तो बहुत बुरा आदमी था।’

‘अच्छा तो बताइए हिटलर का गुनाह क्या था? वह नस्ली और सांस्कृतिक श्रेष्ठता को मानता था। और वह यह मानता था कि श्रेष्ठ नस्लें और संस्कृतियों को दूसरों के देशों पर आक्रमण करके उनको दास बनाने और मारने तक का अधिकार था।’

‘मैंने कहा था न कि वह बहुत बुरा आदमी था।’

‘अमाँ यार यह बताओ कि कोलम्बस के ज़माने से यूरोप में लोग और कर क्या रहे हैं? मेक्सिको और दक्षिण अमेरिका पर जीत हासिल करने के बाद अगले ८० साल में वहाँ के लोगों की जनसंख्या १०० की १० हो गई। यानी करीब ४ से ५ करोड़ लोग मारे उन्होंने। हिटलर ने थोड़ी जल्दी मारे, पर स्पेन वालों से कम ही मारे।’

‘अरे निक साहब, -’

‘फ़्रांस वालों ने अफ़्रीका और उत्तरपूर्व एशिया पर चढ़ाई की, और क्वेबेक पर भी। अंग्रेज़ यह मानते थे कि उनका अधिकार था सभी ‘नीचे लोगों’ पर शासन करना – किपलिंग ने यह संज्ञा दी थी। बेल्जियम वाले कॉङ्गो को किसी यातना गृह की तरह ही चलाता थे। डच और पुर्तगाली-’

‘हाँ भई माना, पुराने साम्राज्यवादी बुरे थे, पर नाज़ियों से बुरे तो कतई नहीं थे।’

निक मेफिस्टो ने बस कन्धे उचका दिए। ‘यूरोप वाले यह मानते थे कि वह “श्रेष्ठ” हैं, इसलिए वह और लोगों की संस्कृति का गला घोंटने, उन्हें दास बनाने, हत्याएँ करने, देश से निकालने के पूरे पूरे हकदार हैं। और इसी नीति के आधार पर यूरोप का झण्डा सैकड़ों सालों तक ऊँचा रहा। मेरे मुवक्किल की नज़र में, हिटलर ने बस एक गलती की।’

‘और वह गलती क्या थी जनाब?’

‘उसने यूरोपियनों पर गाज गिराई।’

‘बिल्कुल सही, पर-’

‘अगर उसने मूल भारतीयों, अफ़्रीका के कालों, या एशियन लोगों को मारा होता, तो उसके पड़ोसियों को कोई फ़र्क न पड़ता। आखिर उन सबने भी तो यही किया था न। लेकन यूरोप के लोगों को भी उसी तराज़ू से तोलना उन्हें नागवार गुज़रा।’

‘बहुत हो गया साहब! अगर हिटलर जीत जाता, तो हम सैकड़ों सालों तक अंधकार में डूब जाते।’

‘हाँ, मूल भारतीय भी १४९२ से उसी अंधकार में डूबे हैं, और अफ़्रीकी लोग भी। कोशिश करने की तो मेरे मुवक्किल पूरी दाद देते हैं, लेकिन असली इज़्ज़त तो उन्हों ही नवाज़ते हैं जो सफल विजेता हैं – जो मार काट कर के राष्ट्र की शान बन जाते हैं।’

‘तो आप यह कह रहे हैं कि हम नाज़ियों जितने ही बुरे हैं।’

‘न न, हम थोड़ी ज़्यादा नज़ाकत वाले हैं। वैसे मेरे मुवक्किल साहब यह ज़रूर कहते हैं कि कनाडा की सुरक्षा नीति यही कहती है कि हमें अपनी पसन्द की दुकान में खरीदारी करने से रोकने वाले किसी भी देश पर नाभिकीय हथियार गिरा दो। और अधिकतर कनाडा वासी इस नीति का पुरज़ोर समर्थन करते हैं, भले ही वैंकूवर में हर साल शान्ति यात्री कितनी ही तादाद में आएँ।’

मेरी दिमाग़ की बत्ती जली ‘यानी कि हिटलर के जोड़ीदार बहुत हैं?’

वकील साहब अब मुस्कुराए। ‘बहुत से भी ज़्यादा, और लगातार पैदा हो रहे हैं हिटलर के जोड़ीदार। नस्लवादी जब मरते हैं तो उन्हें आजकल नरक में घर ढूँढना मुश्किल हो गया है, इतनी भीड़ हो गई है वहाँ।’

किलियन जी, थोड़ी नुक्ताचीनी, “मूल भारतीय” नहीं, “मूल अमरीकी” होना चाहिए।
Original article in English

मध्यस्थहीनता

मुझे शुक्रिया न अदा करें। अर्थशास्त्री होने के तौर पर मेरा तो फ़र्ज़ है कि लक्ष्य तक पहुँचने के और प्रभावी रास्ते सुझाऊँ। यह है वह समस्या, जिसका मैं समाधान खोज रहा था। सिफ़ी.कॉम कह रहा है कि “आईऍसआई आतङ्कवादियों के दुगुना धन देना चाहती है।”

पाकिस्तान की इण्टर सर्विसेज़ इण्टेलिजेंस (आई ऍस आई) ने हाल ही में जम्मू और कश्मीर में आतंकी गुटों को दुगुना धन मुहैय्या कराने का प्रस्ताव किया है – भारत की बाह्य खुफ़िया एजेंसी रिसर्च ऍण्ड ऍनालिसिस विङ्ग ने एक ‘गोपनीय’ रपट में यह बताया है।

स्वाभाविक है कि यह रॉ वाली रपट तो मैंने नहीं देखी है।

प्रधानमन्त्री व अन्य अधिकारियों को भेजी रॉ रपट में लिखा है कि राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को दिए ब्यौरे में आईऍसआई ने कहा है कि जिहादी गुटों ने दृढता खो दी है, जिससे कि तथाकथित`स्वतन्त्रता संग्राम’ कमज़ोर हुआ है, और वित्तीय सीमाएँ इसका प्रमुख कारण है।

तो मुझे यही मानना पड़ेगा कि यह पैसा पाकिस्तान सरकार के जरिए पहले आईऍसआई के पास जाता है और फिर आतङ्कवादियों के पास पहुँचता है। यदि आप मुझसे पूछें तो मैं यही कहूँगा कि आतङ्कवादियों को पैसा थमाने के लिए यह काफ़ी अप्रभावी और लम्बी कड़ी है, ईश्वर ही जानता है कि रास्ते में कितना पैसा चू जाता है।

इससे भी बुरा, कभी कभी एक और कड़ी भी शामिल हो जाती है: पहले पैसा पाकिस्तानी सरकार को दिया जाता है, जो कि पैसा आईऍसआई को देती है, और फिर वह आतङ्कवादियों को देती है। उदाहरण: भारत सरकार ने २००५ में जिहादियों के लिए  पाकिस्तान सरकार को २,५०,००,००० डॉलर दिए। (वह लेख ३१ अक्तूबर, २००५ का है। उसके बाद ३ नवम्बर, और २८ नवम्बर के भी कुछ लेख हैं।)

तो मुझे यही समझ आया कि कम से कम भारत के मामले में, भारत सरकार को पाकिस्तान सरकार व आईऍसआई को जरिया बनाए बगैर सीधे आतङ्कवादियों को पैसा दे देना चाहिए।

पर फिर मुझे एक बात और ध्यान आई। वास्तव में यह पैसा तो भारतीय करदाताओं से ही आता है। पूरी कड़ी है, करदाता से भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार से आईऍसआई से आतङ्कवादी। क्यों न किसी भारतीय बैंक में आतङ्कवादियों के लिए एक खाता खोल दिया जाए जिसमें हम सब करदाता अपनी कमाई का कुछ अंश सीधे जमा करा दें, ताकि आतङ्कवादी अपनी इच्छानुसार ज़रूरत के हिसाब से पैसे निकालते रहें?

आतङ्कवादियों को पैसे देने की यह नई, चमचमाती योजना आपको कैसी लगी? है न सुन्दर, सस्ती और टिकाऊ?

पुनश्च: मैं यह लिखना भूल गया था कि भारत सरकार अफ़ग़ानिस्तान को भी पैसे भेजती रहती है। इस प्रकार भी भारत सरकार जिहादियों तक धन पहुँचाती है। आज के हिन्दुस्तान टाइम्स की यह रपट देखें: “पाकिस्तान अफ़गानी जिहादियों की मदद करगिल में चाहता था

“मुल्ला मोहम्मद रब्बानी, जो कि उस समय अफ़ग़ानी राष्ट्रपति थे… के पास पाकिस्तान से अनुरोध आया था कि वे कश्मीर जिहाद के लिए कुछ २०,०००-३०,००० “सेवक” भेजें। इसके जवाब में जब उन्होंने पाकिस्तानियों को ५,००,००० भेजने की बात कही, तो पाकिस्तानी भौंचक्क रह गए!” ५८५ पन्नों की ‘लड़ती तलवारें’ में बताते हैं, शुजा नवाज़, जिनके भाई आसिफ़ नवाज़ १९९० के दशक में फ़ौज के प्रमुख थे।

Original article in English

क्यों?

यूनवर्सल स्यूडियोज़ को एक किङ्ग कॉङ्ग मञ्च बनाना चाहिए जिसमें एक नया चमचमाता प्रसाधन कक्ष हो, जो कि किसी ऐसे फ़िल्मी सेट में हो जो कि व्हाइट हाउस के ओवल ऑफ़िस की शक्ल का हो, जहाँ कि वह किसी विशाल चन्द्र-खड्ड टेलिस्कोप के शीशे की तरह उभार वाला हो, और उपराष्ट्रपति के दाएँ हाथ में फ़्लश की घुण्डी होगी जो कि नामाङ्कन के लिए द्वितीय पुरस्कार के तौर पर होगा, मार्स फ़ीनिक्स ध्रुवीय लैण्डर के स्थल खोदक औज़ार की तरह होगा।

और यह तब, जब जॉन मॅक्केन बनाम ओबामा चुनाव की दौड़ खत्म होती है, और यदि बरक चुनाव जीत कर हिलैरी क्लिण्टन को उपराष्ट्रपति चुनते हों। तब वह जापानी स्पेस स्टेशन में हारने का इनाम पा सकती हैं, जिसमें उन्हें चीनी पेंचदार फ़ायर्ड्रिल में गोल घूमना होगा, घूमते हुए थोड़ी थोड़ी गुरुत्वाकर्षक तरङ्गें छोड़नी होंगी जो कि पर्यावरणवादियों द्वारा ऊर्जा समस्या का समाधान करने के काम आएँगी ताकि अमेरिका को तेल की महँगाई की चिन्ता नहीं करनी पड़ेगी, जो कि हमारे कच्चे तेल के ऊपर लगे करों की वजह से है।

फिर एम्पायर स्टेट बिल्डिङ्ग पर चढ़ने वाले विशाल वानर मानव जॉर्ज डब्ल्यू बुश अपने बड़े वानरीय हाथों से राष्ट्रपति कक्ष में चढ़ के हिलैरी को दबोच लेंगे, और श्रीमती क्लिण्टन चिल्लाएँगी, “बिल, बिल, मुझे बचा लो बिल, बचा लो”। इस दर्मियान क्लोवर्फ़ील्ड मांस्टर और गॉड्ज़िला न्यू ओर्लींस में एक और कत्रीना तूफ़ान से लड़ रहे होंगे और इमारतें गिरा रहे होंगे, गृह सुरक्षा सचिव डोनल्ड रम्स्फ़ील्ड सुरक्षात्मक ढंग से शॉक ऍण्ड ऑ का धावा बोल देंगे ताकि दोनो विशाल प्राणियों को मेक्सिको की मृत खाड़ी में भेज दिया जाए, जहाँ वे कभी दुबारा खोजने पर भी नहीं मिलेंगे क्योंकि वह शहर ग़ैरक़ानूनी जलमग्न दानव आप्रवासियों को शरण देता है – ये लोग क्यूबा से ऍट्लाण्टिक महासागर पार करके आते हैं।

क्योंकि।

Original article in English

रिलायंस के ग्रामीण कारोबार केन्द्र

कल के ब्यौरों से एक समाचार:

“आयोजित फुटकर कार्यक्रम के तहत रिलायंस रिटेल कई ग्रामीण कारोबार केन्द्र खोलेगा। एक स्तर पर तो यह कृषि उत्पाद को एकत्रित करने के केन्द्र के तौर पर काम करेंगे। दूसरे स्तर पर, यह कृषि – सहायक उत्तम सामग्री और ग्रामीण उपभोक्ता के लिए उत्पाद व सेवाएँ भी प्रदान करेंगे,” अम्बानी जी ने कहा।

यह ब्यौरा बता रहा है कि अम्बानी सौर ऊर्जा के लिए सेमीकण्डक्टर प्लाण्ट भी बिछा रहा है। श्री मुकेश अम्बानी जी, विचार अच्छे हैं।

वे अनवरत एक ही दिशा में चल रहे हैं। देखें,  “ग्रामीण भारत की मदद करने का तेज़, बेहतर तरीका”, जुलाई २००६ से। अम्बानी के अब तक की परियोजनाएँ मुझे पसन्द आईं – शहर निर्माण, ग्रामीण केन्द्र, सौर ऊर्जा। रिलायंस को और ऊर्जा मिले।

(कड़ी के लिए गौतम पाटिल को धन्यवाद।)

Original article in English

प्रथम संशोधन

मेरा अमेरिका महान

जब भी मुझे ट्रकों के पीछे लिखा “मेरा भारत महान” का नारा नज़र आता है, एक झटका लगता है। झटका है, हैरत, नाज़, चिड़चिड़ाहट और उम्मीद से मिश्रित झटका। अपने देश पर नाज़ होने की वजह से यह उम्मीद जगती है कि कि शायद यह सच हो, पर मेरी अन्दरूनी चिड़चिड़ाहट यह मानने से इनकार कर देती है कि भारत महान है।

कई सालों तक मैंने सोचा है कि क्या कोई ऐसी चीज़ है जो भारत को महान बना सकती है? क्या कोई एक चीज़ थी – कोई नीति, कोई उसूल, कोई फ़ैसला, कोई घटना, कुछ भी – जो भारत को अपनी महानता पाने की सुहूलियत दे पाए? अगर मैं भारत को और देशों के साथ तौलूँ – सफल और असफल दोनो तरह के देशों को – तो क्या मैं पता लगा पाऊँगा कि वह एक चीज़ क्या है? धीरे धीरे मेरी सोच इस ओर बढ़ रही है कि जो चीज़ मैं खोज रहा हूँ वह वास्तव में है। मुझे लगता है कि अमेरिका में यह है और भारत में नहीं है।

सतही बराबरी

अमेरिका और भारत के बीच में समानताओं का बारंबार उल्लेख – दोनो जनतन्त्र हैं, और दोनो में विविधता है – यह समानताएँ केवल सतही हैं, और गहराई में जाने पर यह सतही ही सिद्ध होती हैं। असमानताएँ कहीं बड़ी हैं, और उन असमानताओं से साफ़ पता चलता है कि अमेरिका सफल क्यों है और भारत असफल क्यों है। मेरा मानना है कि दोनो देशों का संविधान इनकी सबसे बड़ी असमानता है। इस विषय पर मैंने पहले संक्षेप में कुछ उल्लेख किए हैं लेकिन अब इस मामले में गहराई में जा रहा हूँ – मेरी नज़र में यही भारत और अमेरिका के बीच सबसे बड़ा फ़र्क है।

अमेरिका को महान बनाने वाली चीज़ अमेरिका के संविधान का पहला संशोधन ही है:

कांग्रेस ऐसा कोई क़ानून नहीं बनाएगी जो किसी पन्थ का अनुमोदन करता हो, न ही किसी पन्थ के पालन को निषिद्ध करेने वाला कोई क़ानून बनाएगी, न ही अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, या पत्रकारों और प्रकाशकों की स्वतन्त्रता, न ही लोगों के शान्तिपूर्वक एकत्रित हो कर गोष्ठी करने की स्वतन्त्रता और न ही अपनी समस्याओं के लिए सरकार को याचिका देने के अधिकार का हनन करने वाला कोई क़ानून बनाएगी।

यह पहला संशोधन १५ दिसम्बर १७९१ को लागू हुआ। अमरीकी संविधान के पहले दस संशोधनों को बिल ऑफ़ राइट्स कहा जाता है, यह उनमें से पहला था। पहले संशोधन ने – अन्य चीज़ों के अलावा – पन्थ और राज्य के बीच एक दीवार खड़ी की। १८०२ में थॉमस जॅफ़र्सन ने इसके बारे में लिखा था, उनका मानना था:

कि पन्थ एक ऐसा मुद्दा है जो केवल किसी व्यक्ति और उसके ईश्वर के बीच का मसला है,व्यक्ति को अपनी आस्था और पूजा संबंधित राय के लिए किसी को सफ़ाई देने की ज़रूरत नहीं है, सरकार की शक्तियाँ केवल गतिविधियों पर लागू हों, राय पर नहीं, और मैं सभी अमरीकियों की ओर से सार्वभौम आदर के साथ कहता हूँ कि “विधान सभा” “ऐसा कोई क़ानून नहीं बनाएगी जो किसी पन्थ का अनुमोदन करता हो, न ही किसी पन्थ के पालन को निषिद्ध करने वाला कोई क़ानून बनाएगी” और इस प्रकार राज्यव्यवस्था और पन्थों के बीच एक दीवार होगी। [ज़ोर मेरे द्वारा जोड़ा गया]

पहला संशोधन मूलतः यह करता है कि वह किसी भी व्यक्ति को, समूहों की तानाशाही से बचाता है – राज्य की तानाशाही से भी। यह राज्य को अपना उल्लू सीधा करने के लिए व्यक्ति को नष्ट करने से रोकता है। इससे अमरीकियों को पन्थ की स्वतन्त्रता और पन्थों से स्वतन्त्रता मिलती है। इससे अमरीकियों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता मिलती है, और गोष्ठी करने की स्वतन्त्रता भी। कांग्रेस के किसी भी अधिनियम के जरिए यह अधिकार छीने नहीं जा सकते हैं।

स्पष्ट करता हूँ कि सरकार किसी अमरीकी को क्या करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती:

1. यह किसी अमरीकी को किसी खास पन्थ का समर्थन करने को नहीं कह सकती है। न ही कर द्वारा प्राप्त धन से किसी पन्थ को प्रोत्साहन दे सकती है।

2. किसी भी अमरीकी को अपने मन की बात कहने या किसी भी रूप में अपने आपको अभिव्यक्त करने से नहीं रोक सकती है।

3. किसी भी अमरीकी को शान्तिपूर्वक गोष्ठी करने से नहीं रोक सकती है।

4. किसी भी अमरीकी को सरकार पर मुक़द्दमा करने से नहीं रोक सकती है।

भारत में किसी व्यक्ति को ऐसी संवैधानिक सुरक्षा नहीं है।

1. भारत की सरकार अपने नागरिकों से कर लेती है, पन्थों को प्रचारित करने के लिए। राजनेता इस सुविधा का मत बटोरने के लिए अच्छा उपयोग करते हैं।

2. भारत की सरकार अभिव्यक्ति को रोकती है। समय समय पर किताबें प्रतिबन्धित करती है और लेखकों को परेशान करती है।

3. जब भी मत-बैंक राजनीति के तहत फ़ायदेमन्द लगता है, तब तब भारत की सरकार शान्तिपूर्क गोष्ठी करने सी भी रोकती है।

भारत में, व्यक्ति के मुकाबले सरकार अधिक शक्तिशाली है। और इस शक्ति का वह लगातार व्यक्ति के अधिकारों को छीनने के लिए करती रहती है। किसी जनतन्त्र में सरकार की शक्ति पर लगान लगाना क्यों ज़रूरी है? क्योंकि, वरना मत-बैंक की राजनीति के मिठाई पर नज़र रखते हुए सरकार लोगों को रौंदती रहती है। और जब सरकारी जूते से व्यक्ति कुचला जाता है, तो समाज आहत होता है, और समय बीतते बीतते अवश्यम्भावी नतीजा होता है गरीबी।

हाल की खबरों में

खबर: “राज्य कांग्रेस प्रमुख रमेश चेन्नितल ने केरल राज्य महिला कमीशन की अध्यक्षा न्यायमूर्ति डी श्रीदेवी को इस्तीफ़ा देने को कहा, क्योंकि उनके कमीशन ने लड़कियों को नन बनने के लिए न्यूनतम आयु निर्धारित करने की सिफ़ारिश की।”

खबर: कांग्रेस पार्टी के मुख्य मन्त्री वाई ऍस राजशेखर रेड्डी ने पुलिस को निर्देश दिए कि वे [अहमदिया] समुदाय को किसी सार्वजनिक जगह पर बैठक न करने दें क्योंकि इससे शहर में कानून और व्यव्था भङ्ग हो सकती है।

हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व में एक  प्रतिनिधि मण्डल ने सोमवार को मुख्यमन्त्री से मिल कर यह माँग रखी थी कि अहमदियों, जिन्हें क़ादियानी भी कहते हैं, को यह गोष्ठी करने की अनुमति न दी जाए।

यह विवादास्पद पन्थ शहर के बीचों बीच पब्लिक गार्डंस में अपनी गोष्ठी रखने वाला था…

प्रतिनिधिमण्डल में कई पन्थीय नेता थे, और उनका कहना था कि इस पन्थ की गतिविधियों से मुस्लिम आहत हो रहे थे, क्योंकि वह अपने आपको अहमदिया मुस्लिम कहते हैं और उन्होंने चेतावनी दी कि इस बैठक की अनुमति होने पर क़ानून और व्यवस्था की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

खबर: धर्म के आधार पर आरक्षण मूलतः उस धर्म में परिवर्तित होने के लिए एक बढ़ावा है। उदाहरण कई हैं।

खबर: हज यात्रा में रियायत। यह इन सब में से सबसे अधिक अनैतिक है। यह उन भारतीयों पर कर का बोझ डालता है जो किसी भी सूरत में इस्लाम को बढ़ावा नहीं देना चाहते हैं। यह कर शायद मुस्लिम शासकों द्वारा काफ़िरों के ऊपर लागू किए गए जज़िया से भी ज़्यादा अनैतिक है। भारत सरकार कोई इस्लामी सरकार नहीं है, इसे गैर-मुसलमानों को ऐसा कर देने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए जिसके जरिए इस्लाम की हिमायत होगी।

मेरा भारत महान नहीं है

मेरा भारत के महान होने की संभावना नहीं है, क्योंकि यहाँ पर प्रथम संशोधन के समान कुछ नहीं है। इस पहले संशोधन के न होने से, भारत सरकार आसानी से एक पन्थ को दूसरे से कभी भी भिड़ा सकती है। इससे लड़ाई होती है, और जैसे जैसे सरकार लोगों को पन्थ के नाम पर बाँटने के लिए और अग्रसर होगी, यह लड़ाई और बढ़ेगी।

अगर भारत जाग कर सरकार की शक्ति को सीमित नहीं करता है, तो भारत कभी महान नहीं हो पाएगा।

कड़ियाँ:

आज के न्यूयॉर्क टाइम्स का लेख पढ़ें: “अमेरिका बाकियों की तरह नहीं है, अभिव्यक्ति में बुरा भला कहने का अधिकार भी देता है”.

भारत और अमेरिका के संविधानों की तुलना करने वाला मेरा लेख भी देखें।

वर्णम् का पन्थनिरपेक्ष लक्ष्मण रेखा देखें, और रेश्नल फ़ूल का पन्थनिरपेक्ष भारत, दूर दूर तक नहीं भी।

मुख्यमन्त्रियों के लिए प्रार्थनाएँ का अजूबा देखें। (कश्यप पटेल को शुक्रिया।)

Original article in English