जिहादियों को दान – भाग ३

कुछ समय पहले मैंने भारत द्वारा पाकिस्तानी जिहादी गुटों को दान पर क्षोभ व्यक्ति किया था और फिर उसी लेख की टिप्पणियों का एक प्रत्युत्तर दिया था। पहले लेख की टिप्पणी के तौर पर तनवीर ने लिखा था:

अतनु: आप ठहरे अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट, आपको तो दुनियादारी के बारे में अच्छी तरह मालूम ही होगा। हर चीज़ के लिए तार्किक कारण नहीं होता है, खासतौर पर राजनीति की दुनिया में। आपके तर्क के आधार पर, जब भारत खुद नाभिकीय हथियारों पर इतना खर्च करता है, तो उसे भी किसी प्रकार के अनुदान की उम्मीद करना गलत है। और चूँकि अमरीकी फौज का खर्चा बाकी पूरी दुनिया से कहीं अधिक है, इसलिए अमरीका को अमन और शान्ति की बात करने का कोई हक़ नहीं है। लेकिन फिर भी अमरीका संयुक्त राष्ट्र को पैसा देता है, और जब मन होता है तो उसकी अवमानना कर के अपनी मर्जी से भी काम करता है। जिस भी देश की फौज है, उसे विनाशक त्सुनामी के समय कोई आर्थिक सहायता नहीं मिलनी चाहिए थी। लेकिन दुनिया ऐसे नहीं चलती है साहब। जहाँ तक मुस्लिम आक्रमणकारियों से सम्बन्धित आपकी टिप्पणियों का सवाल है, तो आपको याद रखना चाहिए,  “खून के बदले खून का मतलब पूरी दुनिया में सब खूनी, और ज़िन्दा कोई भी नहीं” साथ ही, अगर हमें अपने इतिहास को ले के इतनी ही चिन्ता है तो हमें बरतानिया का हाई कमीशन बन्द कर देना चाहिए। कम से कम जब तक अंग्रेज़ यहाँ आए, भारत सबसे अमीर देश था। सिर्फ़ मिसाइल का नाम बदल देने से उसका चरित्र नहीं बदल जाता है। चाहें पृथ्वी हो या ग़ौरी, मरेंगे तो उतने ही लोग।

दुनियादारी समझने के लिए अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट लेना ज़रूरी नहीं है।  साधारण अक्ल वाला कोई भी यौवन को प्राप्त व्यक्ति थोड़ा बहुत विचार कर के खुद दुनियादारी के बारे में समझ सकता है। मेरी पूरी दलील का मूलभूत सिद्धान्त लेख के पहले वाक्य में निहित है: पैसे का कोई चरित्र नहीं होता।

किसी भी इकाई के पास सीमित संसाधन होते हैं, चाहे वह इकाई एक अकेला इंसान हो या भरापूरा राष्ट्र। यह उस इकाई की मर्ज़ी है कि वह उन संसाधनों का इस्तेमाल कैसे करें। अगर वह इकाई विनाशक गतिविधियों में संसाधनों को खर्च कर देती है, तो ऐसे फ़ैसले लेने वाली इकाई को और अधिक संसाधन दान में देना और उनको प्रोत्साहन देना किसी भी दृष्टि से नैतिक तो है ही नहीं। इतना ही नहीं यह पूरी तरह अदूरदृष्टिपूर्ण और अनैतिक है। अगर कोई भी देश, किसी दूसरे देश में हाहाकार मचाने के लिए अपने आप को लामबन्द करने में ही अपने संसाधन नष्ट करने पर तुला हो, तो उस देश को किसी से सहानुभूति या भौतिक सहायता की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, देश चाहें जितना बदहाल हो। यह मापदंड मैं सभी राष्ट्रों पर लागू करूँगा ही। आतङ्की राष्ट्रों के मामले में इस बात पर और ज़ोर दूँगा।

इस मानक के आधार पर मैं यहीं कहूँगा कि न तो भारत को किसी और राष्ट्र द्वारा मदद दी जानी चाहिए, न ही ऐसी मदद दिए जाने पर भारत को स्वीकारना चाहिए। जब तक महाविनाश के अस्त्रों और शस्त्रों को एकत्रित करने में भारत अपना अल्प धन खर्च कर रहा है, यही सर्वोचित है। मुझे इस बात का अहसास है कि भारत के पड़ोसी खतरनाक हैं, और नाभिकीय असले से लैस पड़ोसियों को धमका के रखने के लिए भारत को भी नाभिकीय अस्त्र चाहिएँ और उनके प्रक्षेपण के लिए मिसाइलें भीI लेकिन नीति के आधार पर भारत को किसी और राष्ट्र से दान नहीं लेना चाहिए।

ज़रूरी बात। जो देश अपने सीमित धन का इस्तेमाल भारत को नष्ट करने के लिए हथियार खरीदने में ही खर्च कर डालते हैं, उन्हें तो दान कतई नहीं देना चाहिए। इसके दो कारण हैं, पहला, कि पैसे का कोई चरित्र नहीं होता: भारत, गरीबों को रोटी खिलाने के लिए पैसे दे या आम निरीह भारतीयों को मारने के लिए जिहादियों की बड़ी फौज खड़ी करने के लिए पैसे दे – पैसा तो पैसा ही है, एक पैसे को आप दूसरे पैसे से अलग नहीं पहचान सकते हैं। ऐसे पैसा देना ग़ैरज़िम्मेदारी है और अनैतिक है। इस प्रकार की बावलेपन वाली हरकत आखिर होती क्यों है यह समझना भी आसान ही है। जिनके पास दानवीर कर्ण बनने की ज़िम्मेदारी है वे स्वयं तो इसके दुष्प्रभाव से सर्वथा सुरक्षित ही हैं। अगली बार जब जिहादी आतङ्कवादी – भारतीय नेताओं द्वारा दिए पैसे से – आतङ्क फैला के भारत में बीसियों लोग मारेंगे, तो इन दानवीरों को अपना खून पसीना थोड़ी बहाना होगा। बहुत दुख की और अशोभनीय बात है कि नेताओं के पास कड़ी सुरक्षा है (और सड़क पर चलने वाले आम आदमी के पास नहीं है) इसलिए अपने किए का फल उन्हें कभी भुगतना ही नहीं पड़ता।

राष्ट्रों द्वारा दान के विरोध का मेरा दूसरा कारण है – दान वैकल्पिक, स्वेच्छा से दिया जाना चाहिए। अगर मैं आपकी जेब काटूँ और फिर वह पैसा दान कर दूँ, तो भी इसमें कोई बड़ाई तो नहीं है न? और भी बुरा, अगर मैं चक्कू की नोंक पर पैसे हड़पूँ और फिर पैसा भी दूँ उसे जिसे आप कभी देना नहीं चाहते थे। भारत सरकार, करदाता का पैसा ले के उसका कुछ हिस्सा पाकिस्तान को देते समय ठीक यही करती है। भारत के लोगों को इस बात की आज़ादी दी जानी चाहिए कि वे किसे दान देना चाहते हैं। भारत का नागरिक होने के नाते प्रधानमन्त्री जी अपना खुद का पैसा पाकिस्तान भेजने को स्वतन्त्र हैं, और बाकी नागरिक भी इसी तरह स्वतन्त्र हैं। लेकिन मेरा पैसा ले के पाकिस्तान में बाँट देना – यह बिल्कुल अनैतिक है। उन्होंने मेरी इज़ाज़त नहीं ली है, और इज़ाज़त लिए बगैर भी यह समझना मुश्किल नहीं है कि मैं कभी पाकिस्तानी जिहादियों को अपनी कमाई भेजने की हिमायात नहीं करूँगा। हमारे प्रधानमन्त्री जी मन ही मन इतना भर विचार कर लें – भारत के ४० करोड़ लोग दिन में एक डॉलर नहीं कमा पाते हैं। उनसे अगर वे इन ४० करोड़ लोगों से पूछें कि भइया, अपने यहाँ आतंक फैलाने के लिए ढाई करोड़ डॉलर पड़ोस में दे दें क्या – तो क्या जवाब मिलेगा उन्हें?

प्ररधानमन्त्री को पूर्ण आदर के साथ मैं यही कहना चाहूँगा कि यह बेवकूफ़ी है। इसके लिए मैं उन्हें ज़िम्मेदार मानता हूँ। यह बात मैं उनके मुँह पर भी कह सकता हूँ।

साथ ही यह भी कहना चाहूँगा कि यह कुछ नया नहीं है। भारतीय प्रधानमन्त्री चिरकाल से पाकिस्तान के मामले में बेवकूफ़ी वाली नीतियाँ लागू करते आएँ हैं। शुरुआत हुई नेहरू से। पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण किया और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के आगे मामला टिका दिया। उनकी बेटी इन्दिरा ने यह कचरा साफ़ करने की कोई कोशिश नहीं की। पाकिस्तानी फौज की शर्मनाक हार के बाद, सारे पत्ते हमारे हाथ में थे, हमारे पास ९०,००० पाकिस्तानी युद्धबन्दी थे, लेकिन फिर भी अपनी बात मनवाना उन्हें नहीं आया। फिर वाजपेयी ने पृथ्वीराज चौहान की परम्परा को निभाया। चल पड़े “बस यात्रा” पर और मुशर्रफ़ की ओर से बस की सीट के पीछे से छुरा घुँपवा के आए। नहीं यह मैंने गलत कहा। छुरा उन्हें नहीं लगा – एक हज़ार गरीब सिपाहियों को लगा जो करगिल की बर्फ़ में दब के मर गए। वाजपेयी जी अपने पहले वालों की तरह अपने घर में आराम फ़रमा रहे थे, पूर्णतः सुरक्षित। न तो नेहरू पर कोई असर पड़ा और न ही उनके भाई बन्धुओं पर। भारतीय सेना में जो फौजी भरती होते हैं वही इन गलतियों की कीमत चुकाते हैं – अपनी जान दे के। गरीब फौजी कटते हैं, और उसके बाद नेहरू जैसे लोग, लता मङ्गेशकर के  “ऐ मेरे वतन के लोगो“ सुन कर घड़ियाली आँसू बहाते हैं।

अर्थशास्त्री हमेशा यह कहते हैं कि जब तक नीति निर्धरकों को प्रलोभन सही दिए जाएँगे, दुनिया किसी भी समस्या का सही समाधान खोजने को तत्पर रहेगी। मैं पूरी तरह से इस बात को मानता हूँ। आधुनिक युद्ध की समस्या, प्रलोभन की ही है। अगर खुद के बच्चे ईराक़ में भेजने पड़ते तो मूर्ख बुश आक्रमण करने को कितना तत्पर होता? अगर अमरीकी सिनेटर बनने के लिए बच्चों को फौज में भर्ती करना ज़रूरी होता तो अमरीकी सिनेट दुनिया में कितने युद्धों की मञ्जूरी देती? अगर सरकार चलाने वालों के सभी बच्चों का फौज में होना लाज़िमी होता तो कोई भी सरकार कितने युद्ध शुरू करने की सोचती? नेताओं की वजह से ही, और कभी कभी सेनापतियों की वजह से – जिन्हें कुछ खोने का डर नहीं है – इतने युद्ध होते हैं।

वापस तनवीर की टिप्पणी पर आते हैं। हाँ, अगर कोई देश अपने खिलाफ़ भविष्य में होने वाले युद्धों की तैयारी में लगा हो तो वह अपने नागरिकों की त्सुनामी या भूकम्प के समय में मदद करने के काबिल नहीं होता। अगर पाकिस्तान अमरीका को पाँच खरब डॉलर दे कर ऍफ़१६ विमान खरीदता है, और उसके बाद कटोरा ले के कुछ लाख डॉलर की भीख माँगता है ताकि उसके नागरिकों की मदद की जा सके, तो दया और धन के बजाय ढोंगी, पाखण्डी पाकिस्तान को तिरस्कार मिलना चाहिए। 

जब भी गैर सरकारी संस्थान पूरी दुनिया में जा के गरीबों की मदद करने के लिए भीख माँगते हैं तो मुझे यह यह समझ नहीं आता कि वे दुनिया भर की सेनाओं द्वारा संसाधन नष्ट करने पर वे कुछ क्यों नहीं करते। मैं खुद इनका स्वयंसेवक रहा हूँ, और हाँ, मानता हूँ, यह मेरी मूर्खता थी। एक संस्था के स्वंयसेवी पैसा इकट्ठा करने में काफ़ी समय लगाते थे। कुछ लाख डॉलर के लिए। और फिर इसके लिए वह अपने आपको साधुवाद देते थे। यही समय सैन्य खर्चा कम करने की सोच में लगाया जाता, युद्ध के आगे की सोचने में लगाया जाता, तो करोड़ों डॉलर बचते – सिर्फ़ शिक्षा आदि के लिए कुछ लाख नहीं। लेकिन नहीं। अनुपयुक्त प्रणाली को बदलने के के बारे में सोचने के बजाय बस चन्द पैसे इकट्ठे करना, संस्थाओं को मूर्खता है।

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मैंने लेखन बन्द किया है। कारण? मैं निराश हो चुका हूँ, पूरी तरह। कुछ दिनों से यह सोच रहा हूँ कि यह प्रणाली इतनी खराब है कि इसे बदलने की कोशिश भी करना बेकार है। अनन्त चक्र है। राजा बुरा है क्योंकि प्रजा अज्ञानी और मूर्ख है। राजा बुरा है तो प्रजा सुधरेगी भी नहीं। मुझे विश्वास है कि कुछ पाठक बहुमत को अज्ञानी और मूर्ख कहे जाने पर आपत्ति करेंगे। लेकिन आप सिद्ध करें कि बहुमत अज्ञानी और मूर्ख नहीं है। इतनी बुरी हालत के लिए ज़िम्मेदार कौन है? भारत में २५ करोड़ लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं, और यह रेखा खुद इतनी नीचे है कि आपको ऊपर रहने के लिए बस दिन की २००० कैलोरी खरीदनी होंगी। सोचिए: अगर २००० कैलोरी खरीदने लायक आपके पास दिन के सात रुपए हैं तो आप गरीबी रेखा के ऊपर हैं। इस परिभाषा के अनुसार तब आप गरीब नहीं हैं। लेकिन फिर भी पच्चीस करोड़ लोग – पूरे पश्चिमी यूरोप की जनसङ्ख्या के बराबर के लोग – ऐसे हैं जिनके पास उतना भी नहीं है। इस खड्ड में हम पहुँचे कैसे? जब भारत आज़ाद हुआ था तो बस ३५ करोड़ लोग थे, आधे गरीब। इतने सालों के विकास, उन्नति, प्रगति, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों, नेहरूवादी समाजवादी कार्यक्रमों के बाद हमने बिल्कुल गरीब लोगों की सङ्ख्या में साढ़े सात करोड़ और जोड़ दिए हैं, घटाना तो दूर की बात। अगर वास्तव में यह राष्ट्र सामूहिक रूप से इससे बेहतर काम करने लायक था, तो ऐसा क्यों हुआ? क्या नेता मूर्ख थे? या जो लोग हर बार इन चोरों को सत्ता दे देते थे, वह मूर्ख थे?

जिन नीतियों ने हमें गड्ढे में डाल दिया है, वैसी ही और भी लगातार आ रही हैं। और क्यों न आएँ? प्रलोभन का ढाँचा तो नहीं बदला है। नेताओं और नौकरशाहों को अभी भी उन्हीं विफल नीतियों को लागू करने का प्रलोभन है। अर्थव्यवस्था की हालत बुरी होती है पर उनकी नहीं। जब तक प्रलोभन का यह ढाँचा नहीं बदलेगा, भारत के लिए कुछ आशा करना बेकार है। 

खेद है कि मैं खुशी के गीत गाते हुए, भारतीय उपभोक्ता का गुणगान करते हुए, विकास से भारत के परिवर्तन की कहानी नहीं सुना रहा। यह गान करने वाले लोग अधिकतर बेहोशी की हालत में होते हैं। शायद मैं भी किसी दिन यह भाँग का गोला खा के मस्त हो जाऊँ।  लेकिन तब तक नीति निर्धारकों के प्रलोभनों को सही दिशा में ले जाने के बारे में कुछ और लिखूँगा। 

Original article in English

भारत पाकिस्तानी जिहाद के लिए पैसे दे रहा है – प्रत्युत्तर

भारत पाकिस्तान के जिहादी गुटों को पैसा दे रहा है” पर डैन ने कहा:

आप यह भी तो कह सकते थे कि पाकिस्तान की ज़रूरत के समय भारत की दया और दान की वजह से कम से कम कुछ पाकिस्तानियों पर अच्छा असर पड़ेगा। शायद इस मदद से दो लोगों के दिल और मन बदलेंऔर हो सकता है कि इससे आपके पड़ोसियों के अन्दर बगल के घरों पर बम गिराने कि इच्छा कम हो।

डैन जीमज़ाक कर रहे हों तो बात और हैवरना आपकी मासूमियत पर मुस्कुराहट ही आती है। अगर २,५०,००,००० डॉलर से दो दिल बदल जाएँगे तो कुछ मिलियन दिल बदलने के लिए ब्राज़िलियन** डॉलरों की ज़रूरत होगी(और इतने पैसे की उधारी – आन्तरिक व विदेशी मिला के – तो अमरीका की भी नहीं है – कुछ हज़ार खरब डॉलर ही है।)
डैन साहबपाकिस्तानी सैन्य नीति, पाकिस्तानी सेना निर्धारित करती है। वह तो छड़िएवहाँ सब कुछ सेना ही निर्धारित करती है। कुछ साल छोड़ दें तो पाकिस्तान हमेशा से ही सैनिक तानाशाही में रहा है। इसलिएआम आदमी कुछ भी सोचे-मानेइसका रत्ती भर असर पाकिस्तान की नीतियों पर नहीं पड़ने वाला। पड़ता भी होतो भी यह आम आदमी “शैतान काफ़िर बुतपरस्ती” हिन्दुओं के देश को इस दुनिया से मिटा देने के लिए घास तक छीलने और खाने को तैयार होगा। पाकिस्तान के नेता सार्वजनिक रूप से कई बार भारत के खिलाफ़ १०००-साला जिहाद का वादा कर चुके हैं। यह भी मान के चल लें कि ये सारे जिहाद एक साथ ही शुरू हुएतो भी काफ़िर भारत के खिलाफ़ ९५० साल की जिहाद बाकी हैअगर ये जिहाद एक के बाद एक होंगे तो कुफ़्र भारत को ३००० साल और लड़ना होगा।

आप कह सकते हैं कि बुतपरस्त शैतान हिन्दू होने के नाते मैं बहुत अधिक बढ़ा चढ़ा के बातें कर रहा हूँ। शायद यह सही है। पर हम तो यहाँ बस अतिशयोक्ति अलङ्कार पर बहस-बात कर रहे हैंऔर उधर पाकिस्तान तो $५,००,००,००,००० (यानी पाँच खरब डॉलर) के ऍफ़-१६ खरीद रहा हैबातें नहीं कर रहा है। इसके अलावा और भी बहुत सा असला ले रहा हैपाँच पे दस की शर्त लगी कि इस असले का इस्तेमाल अफ़ग़ानिस्तानचीनसऊदी अरबईरानया पूर्व सोवियत यूनियन के गणराज्यों के खिलाफ़ नहीं होने वाला है। इनका निशाना भारत है अजीज़ डैन साहब।

मेरे पुरखे बहुदेवपूजी होने के नातेबर्बर इस्लामी आक्रमणकारियों की क्रूरता का ग्रास बनेइनके नेता थे बाबरग़ौर मुहम्मदमहमूद ग़ज़नीअहमद शाह अब्दाली। ये शख्स तो निकल लिए पर अपनी विरासत छोड़ गए हैं। पाकिस्तान की खूनी मिसाइलें जो नाभिकीय अस्त्र गिराने के काबिल हैंइन्ही महाशयों के नाम पर रखी गई हैं जो भारत को नष्ट करने कभी आए थे। इन मिसाइलों का मुँह सउदी अरब या चीन या अफ़ग़ानिस्तान की ओर नहीं है। इनका मुँह मुम्बईनई दिल्लीबङ्गलोर और नागपुर(मेरा घर) की ओर है ताकि ये वह सब निपटा सकें जो इनके हमनाम सैकड़ों सालों पहले पूरा नहीं कर पाए थे।

वापस उसी बात पर आते हैं, यानी भारत द्वारा पाकिस्तानी जिहादियों को पैसे दिए जाने वाली बात पर। मैंने पिछले लेख में सबसे पहले जो कहा था उसी को फिर से यहाँ दोहराता हूँ: पैसे का कोई चरित्र नहीं होता है।

आप पाकिस्तान को किस चीज़ के लिए पैसे भेज रहे हैं, इससे क्या फ़र्क पड़ता है? जब तक पाकिस्तान ढाई करोड़ डॉलर से अधिक पैसा आतङ्कवाद को पनपने में लगा रहा है, तब तक यह माना जा सकता है कि भारत द्वारा दिया गया दान पूरी तरह से आतङ्कवाद के प्रोत्साहन में ही काम आएगा। यह लीजिए गणित। अगर पाकिस्तान, भारत को नष्ट करने के लिए अपने ऊपर और आतङ्कियों के ऊपर केवल १ करोड़ डॉलर खर्च कर रहा होता, तो इसका यह मतलब होता कि ढाई करोड़ डॉलर उन्हें भेज कर हम १ करोड़ रुपए अपने आपको नष्ट करने के लिए ही दान में दे रहे हैं, और बाकी डेढ़ करोड़, शायद, भूखों को रोटी खिलाने के लिए बचेगा। पर अगर पाकिस्तान भारत को नष्ट करने के लिए $५ खरब के हथियार खरीद रहा है, तो भारत द्वारा अमरीका को २.५ करोड़ भेजने का मतलब है भारत को नष्ट करने के खर्चे की आधा फ़ीसदी रकम का योगदान, भूखों को रोटी देने के लिए कुछ भी नहीं। दूसरे शब्दों में, आँख के अन्धे, गाँठ के पूरे।

अगर पैसे का अपना कोई चरित्र न होने का मेरा तर्क अभी भी पूरी तरह स्पष्ट न हुआ हो, तो मैं एक और उदाहरण से समझाता हूँ। अगर पाकिस्तान अमेरिका से बस एक ऍफ़-१६ कम खरीदता है, तो उसके पास भूकम्प पीड़ितों की मदद के लिए दस करोड़ डॉलर बिना कुछ किए धरे आ जाते हैं।  अगर उनके पास हथियार खरीदने के पैसे हैं तो उन्हें अपने जानी दुश्मन से दान लेने की कुछ खास ज़रूरत है ही नहीं।

भारत सरकार को मेरी ओर से कुछ बिन माँगी फ़ोकट की सलाह: पहले दिया घर में जलाओ। अगर आप नई दिल्ली और भारत के बाकी हिस्सों की झुग्गियों में झाँकेंगे तो आपको लाखों कश्मीरी मिलेंगे जिन्हें अपने पुरखों के इलाकों से खदेड़ा गया है, पूरी नस्ल को साफ़ किया गया है। पहले उन्हें दो ढाई करोड़ डॉलर, बेवकूफ़ों।

** [ब्राज़िलियन एक बहुत बड़ी अज्ञात सङ्ख्या को कहते हैं। यह शब्द बना ऐसे। राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश को बताया गया कि एक मुठभेड़ में तीन ब्राज़ीलियन सैनिक मारे गए। उन्होंने शालीनता अपना सर नीचे झुका लिया। उनके सलाहकार इस भावुकता से चकराए, आखिर सैनिक ब्राज़ील के थे, हमारे नहीं।  फिर उन्होंने अपना सर उठाया और पूछा, “एक ब्राज़िलियन बराबर कितने मिलियन?”]

[इस धारावाहिक की आखिरी किश्त: भारत पाकिस्तानी जिहादियों को पैसा दे रहा है का भाग ३।]
Original article in English

भारत पाकिस्तान के जिहादी गुटों को पैसा दे रहा है

पैसे का कोई चरित्र नहीं होता है

अगर मैंने अपने पड़ोसी को राशन खऱीदने के लिए पैसा दियातो मैंने सच्चरित्र होने का सुबूत देते हुए पड़ोसी धर्म निभायालेकिन अगर पड़ोसी शराबीनशेड़ी हो तोहो सकता है कि उसे पैसे दे के मैं उसे फ़ोकट की दारू दे रहा हूँ। मान लो कि मैं पैसे देने के बजाय खुद ही राशन खरीद लाता हूँ और सीधे उसके घर दे आता हूँतो भी उसके तो शराब के पैसे ही बचे। इससे भी बुरा। अगर मेरा पड़ोसी वास्तव में अपने घर के तहखाने में बम बनाता होऔर समय समय पर मजे लेने के लिए मेरे घर में गिरा के उसे तहस नहस करता रहता हो तोनिश्चय ही दयाभाव से ओतप्रोत हो के उसे राशन के पैसे देनेऔर मेरे ही खिलाफ़ प्रयुक्त बमों के लिए पैसे देने, दोनो सूरतों में कोई खास फ़र्क नहीं है।

यह बात तो आसानी से समझ आ जाती है नलेकिन हमारे महात्मारूपी सुचरित्र नेताओं को क्यों समझ नहीं आती हैपाकिस्तान को २,५०,००,००० अमरीकी डॉलर का दान देने का मतलब है जिहादियों को भारत में आतङ्क फैलाने के लिए कुछ पैसा देना। बात को थोड़ा और समझते हैं। भारत एक दयालु, सुचरित्र देश है। कत्रीना तूफ़ान के बाद अमरीका को भारत ने पचास लाख डॉलर भेजे थे। अब अमरीका से ८० ऍफ़-१६ खरीदने वाले देश को भारत ढाई लाख डॉलर देने जा रहा है। इन ऍफ़-१६  जहाज़ों की कीमत में लाखों गरीब पाकिस्तानियों को खिलाया पिलायासजाया धजायापढ़ाया लिखाया और आमोदित प्रमोदित किया जा सकता था। इसके बजायपाकिस्तान अपने लोगों को भूखों मरने से बचाने में इस सीमित धन का इस्तेमाल नहीं कर रहा हैबल्कि ऐसी चीज़ में खर्च कर रहा है जिससे कि ज़रूरत पड़ने पर भारत पर बम गिराए जा सकें। और तो औरपाकिस्तानियों के इस प्रण को पूरा करने में पूरी पूरी मदद करने के लिएभारत उन्हें एक ढाई करोड़ डॉलर का चेक भी भेज रहा है!

सैकड़ों सालों से धिम्मी(मुस्लिम शासकों के अधीन ग़ैर मुस्लिम प्रजा) बने रहने से ऐसा ही होता है। भारतीय मानस में धिम्मीपना कूट कूट के भरा हुआ है। आज की तारीख में जज़िया(करजो गैर-मुस्लिम प्रजा मुस्लिम शासक को देती थी) देने की कोई मजबूरी नहीं है। लेकिन पुरानी आदतें जाती कहाँ हैं। चाहें जितना छिपा लेंयह ढाई करोड़ डॉलर जज़िया ही है जो धिम्मी दे रहे हैं।

भारत में करोड़ों भूखे नङ्गे बच्चे इधर उधर कूद रहे हैं। ढाई करोड़ डॉलर की मदद से ये बच्चे कुछ इंसान की तरह जी पाते। पर अब हम पाकिस्तानी जिहादियों पर पैसे लुटा रहे हैंजो कुछ और भारतीय शहरों में बम विस्फोट करेंगे। वास्तव मेंअनन्त और अनादि काल से मूर्खता प्रदर्शित करने वालों को वही मिलता है जो उनकी अक्ल के लायक होता है।

पुनश्च ३ नवम्बर २००५: टिप्पणियों की प्रतिक्रिया स्वरूप एक और लेख यहाँ देखें।


Original article in English, 2005-10-31

हिटलर के जोड़ीदार बहुत हैं

कनाडा के प्रकाशन ‘द प्रॉविंस’ (मङ्गलवार, १ मई १९९०) से, लेखक: क्रॉफ़र्ड किलियन।

ऍडॉल्फ़ हिटलर के बहुत से जोड़ीदार हैं

मेरे वकील साहब, निक मेफ़िस्टो, कल मुझे जश्न मनाने दावत पर ले गए, चिन्ता हुई।

निक साहब अजीबोगरीब चीज़ों की वकालत करते हैं। वह जिन चीज़ों की वकालत करते हैं, जिन चीज़ों का वह जश्न मनाते हैं, आम लोगों को उनसे घिन ही होती है।

‘ऍडॉल्फ़ हिटलर की ४५वीं सालगिरह है,’ निक साहब ने फ़रमाया ‘मेरे मुवक्किल ३० अप्रैल १९४५ से उनकी आवभगत कर रहे हैं- और साथ ही उनकी छीछालेदर भी कर रहे हैं।’

‘मेरा अन्देशा है कि आपके मुवक्किल को ऐसे दैत्य पर बहुत नाज़ है।,’ मैंने कहा।

‘अमा, हिटलर कोई दैत्य वैत्य नहीं था।’

‘क्या! द्वितीय विश्व युद्ध का कारक, थोक में हत्या करने वाला जल्लाद, दैत्य नहीं था?’

‘याद कीजिए, मेरे मुवक्किल ने बाल धूप में सफ़ेद नहीं किए है। हिटलर तो एक आम सा नेता था।’

‘क्या बेहूदी बात कर रहे हैं आप! वह तो बहुत बुरा आदमी था।’

‘अच्छा तो बताइए हिटलर का गुनाह क्या था? वह नस्ली और सांस्कृतिक श्रेष्ठता को मानता था। और वह यह मानता था कि श्रेष्ठ नस्लें और संस्कृतियों को दूसरों के देशों पर आक्रमण करके उनको दास बनाने और मारने तक का अधिकार था।’

‘मैंने कहा था न कि वह बहुत बुरा आदमी था।’

‘अमाँ यार यह बताओ कि कोलम्बस के ज़माने से यूरोप में लोग और कर क्या रहे हैं? मेक्सिको और दक्षिण अमेरिका पर जीत हासिल करने के बाद अगले ८० साल में वहाँ के लोगों की जनसंख्या १०० की १० हो गई। यानी करीब ४ से ५ करोड़ लोग मारे उन्होंने। हिटलर ने थोड़ी जल्दी मारे, पर स्पेन वालों से कम ही मारे।’

‘अरे निक साहब, -’

‘फ़्रांस वालों ने अफ़्रीका और उत्तरपूर्व एशिया पर चढ़ाई की, और क्वेबेक पर भी। अंग्रेज़ यह मानते थे कि उनका अधिकार था सभी ‘नीचे लोगों’ पर शासन करना – किपलिंग ने यह संज्ञा दी थी। बेल्जियम वाले कॉङ्गो को किसी यातना गृह की तरह ही चलाता थे। डच और पुर्तगाली-’

‘हाँ भई माना, पुराने साम्राज्यवादी बुरे थे, पर नाज़ियों से बुरे तो कतई नहीं थे।’

निक मेफिस्टो ने बस कन्धे उचका दिए। ‘यूरोप वाले यह मानते थे कि वह “श्रेष्ठ” हैं, इसलिए वह और लोगों की संस्कृति का गला घोंटने, उन्हें दास बनाने, हत्याएँ करने, देश से निकालने के पूरे पूरे हकदार हैं। और इसी नीति के आधार पर यूरोप का झण्डा सैकड़ों सालों तक ऊँचा रहा। मेरे मुवक्किल की नज़र में, हिटलर ने बस एक गलती की।’

‘और वह गलती क्या थी जनाब?’

‘उसने यूरोपियनों पर गाज गिराई।’

‘बिल्कुल सही, पर-’

‘अगर उसने मूल भारतीयों, अफ़्रीका के कालों, या एशियन लोगों को मारा होता, तो उसके पड़ोसियों को कोई फ़र्क न पड़ता। आखिर उन सबने भी तो यही किया था न। लेकन यूरोप के लोगों को भी उसी तराज़ू से तोलना उन्हें नागवार गुज़रा।’

‘बहुत हो गया साहब! अगर हिटलर जीत जाता, तो हम सैकड़ों सालों तक अंधकार में डूब जाते।’

‘हाँ, मूल भारतीय भी १४९२ से उसी अंधकार में डूबे हैं, और अफ़्रीकी लोग भी। कोशिश करने की तो मेरे मुवक्किल पूरी दाद देते हैं, लेकिन असली इज़्ज़त तो उन्हों ही नवाज़ते हैं जो सफल विजेता हैं – जो मार काट कर के राष्ट्र की शान बन जाते हैं।’

‘तो आप यह कह रहे हैं कि हम नाज़ियों जितने ही बुरे हैं।’

‘न न, हम थोड़ी ज़्यादा नज़ाकत वाले हैं। वैसे मेरे मुवक्किल साहब यह ज़रूर कहते हैं कि कनाडा की सुरक्षा नीति यही कहती है कि हमें अपनी पसन्द की दुकान में खरीदारी करने से रोकने वाले किसी भी देश पर नाभिकीय हथियार गिरा दो। और अधिकतर कनाडा वासी इस नीति का पुरज़ोर समर्थन करते हैं, भले ही वैंकूवर में हर साल शान्ति यात्री कितनी ही तादाद में आएँ।’

मेरी दिमाग़ की बत्ती जली ‘यानी कि हिटलर के जोड़ीदार बहुत हैं?’

वकील साहब अब मुस्कुराए। ‘बहुत से भी ज़्यादा, और लगातार पैदा हो रहे हैं हिटलर के जोड़ीदार। नस्लवादी जब मरते हैं तो उन्हें आजकल नरक में घर ढूँढना मुश्किल हो गया है, इतनी भीड़ हो गई है वहाँ।’

किलियन जी, थोड़ी नुक्ताचीनी, “मूल भारतीय” नहीं, “मूल अमरीकी” होना चाहिए।
Original article in English